एस्ट्रोलॉजी का इतिहास-Astrology Ka Itihas

एस्ट्रोलॉजी का इतिहास – आज के युग में एस्ट्रोलॉजी मानवीय जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, एस्ट्रोलॉजी का मानव जीवन में बहुत ही ज्यादा महत्त्व है  और इस आधुनिक दुनिया में जब भी किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार कि समस्या (स्वास्थ) को छोडकर तो वह व्यक्ति अपनी समस्या के निवारण के लिए आम तौर पर किसी अस्ट्रोलोजर के पास जाना उचित समझता है, या फिर उसे उस समय एस्ट्रोलॉजी पर ज्यादा विश्वाश होता है | और यह भी संभव है कि वह व्यक्ति सभी जगह से प्रयास करने के बाद उसे उसकी समस्या का समाधान के लिए वह एस्ट्रोलॉजी ही एक मात्र आशा कि किरण नजर आती है, और यही तो एस्ट्रोलॉजी का इतिहास रहा है कि जब भी कोई व्यक्ति किसी गंभीर समस्या से घिरा हुआ रहता है तो उसे सार प्रयास करने के बाद केवल एस्ट्रोलॉजी पास ही विश्वाश रह जाता है | क्यों कि माना जाता है कि एस्ट्रोलॉजी के उपाय करने से व्यक्ति को उसकी समस्या से राहत मिलती है, चाहे वह धन संबंधित उपाय हों या अन्य कोई उपाय |

अगर देखा जाये तो प्राचीनकाल से लेकर अबतक यह एस्ट्रोलॉजी का इतिहास रहा है कि वह चाहे किसी भी प्रकार से किसी भी व्यक्ति के जन्मकाल से लेकर उसकी मृत्युकाल तक का उसका सारा इतिहास बताने में सक्षम है | एस्ट्रोलॉजी के इतिहास में एस्ट्रोलॉजी के उदय से लेकर अबतक शायद ही कभी एस्ट्रोलॉजी कि गणना गलत साबित हुई हो और एस्ट्रोलॉजी प्राचीनकाल से लेकर आज के आधुनिक युग में लगभग दुनिया के सभी देशों में प्रसिद्ध है |

दुनियाभर में एस्ट्रोलॉजी बहुत ही प्रसिद्ध है और यह तो प्राचीनकाल का ट्रेंड है जो मेरे हिसाब से दुनिया के अंत तक कायम रहेगा | यूँ तो इस आधुनिक दुनिया में लगभग सभी व्यक्ति इससे परिचित हैं और कभी न कभी इस दुनिया के  लगभग सारे परिवार के मुखिया अपनी-अपनी धार्मिक नियमों का पालन करते हुये अपने धर्म के अनुसार किसी न किसी रूप में एस्ट्रोलॉजी का उपयोग किये होंगे | चाहे वह परिवार में किसी बच्चे के जनम के समय उसके नामाकरण को लेकर हो या अन्य कोई धार्मिक क्रिया या फिर कोई अन्य आयोजन या पारंपरिक प्रथा जिसमे एस्ट्रोलॉजी  कही न कही शामिल जरुर रहा है |

अगर एस्ट्रोलॉजी का इतिहास देखा जाये तो जबसे एस्ट्रोलॉजी का उपयोग शुरू हुआ है तबसे लेकर अबतक बहुत सारी एस्ट्रोलॉजी भविष्यवाणियाँ इतिहास के गर्त से निकल कर देखा जाये तो लगभग शत प्रतिशत सत्य साबित हुई हैं तो ऐसा क्या है एस्ट्रोलॉजी में जिसके कारण लोगों का विश्वाश एस्ट्रोलॉजी में अभी तक बना हुआ है. अभी तक कायम है और ऐसा क्या है एस्ट्रोलॉजी में जो इसकी भविष्यवाणी लगभग सत्य होती हैं और जो लोग अस्ट्रोलोगेर के पास जाते हैं क्या उन्होंने ने कभी सोचा है कि इस एस्ट्रोलॉजी का उदय कैसे हुआ? इस संसार में एस्ट्रोलॉजी कि शुरुआत कैसे और कब हुई इसका जन्म कैसे हुआ |

चलिये मैं आपको यह एस्ट्रोलॉजी का इतिहास बताने का प्रयास करता हूँ, जिससे कि आपको भी पता चले कि एस्ट्रोलॉजी का उदय कहा से हुआ और इसी गणना इतनी सटीक कैसे साबित होती हैं इसके पीछे क्या कारण है और प्रचीनकाल से लेकर अबतक यह मानवीय जीवन में इतना महत्त्व क्यों रखती है |

प्राचीन मान्यता के अनुसार एस्ट्रोलॉजी का उदय भारत में हुआ था और इसका उपयोग उस समय ग्रह नक्षत्रों की चाल की  गणना करने के लिए किया जाता था और यह विद्या भारत में उदित एवं विकसित कि गयी थी, जिसका उपयोग पंचांग बनाने में किया जाता था |

और इसी पंचांग के अनुसार सभी प्रकार के तीज-त्यौहार, व्रत, पर्व मनाये जाते हैं | प्राचीन भारत का नाम आर्यावर्त हुआ करता था और यह आर्यों के देश के नाम से जाना जाता था क्यों कि उस समय के लोग यज्ञ-हवन किया करते थे और यज्ञ का विशिष्ट फल प्राप्त करने के लिए उनका एक निश्चित समय पर करना अति आवश्यक था, इसके लिए भारतीय आर्यों ने सबसे पहले भारतीय वेदों से  सूर्य और चन्द्रमा की स्तिथियों से काल का ज्ञान प्राप्त करना प्रारंभ किया |

 जिसका वर्णन पौराणिक ग्रन्थ ऋग्वेद में मिलता है जिसके अनुसार ऋग्वेद काल के आर्यों ने चन्द्रमा से  सौरवर्ष कि गणना का ज्ञान प्राप्त कर लिया था | आर्यों ने चन्द्रमा से सम्बद्ध १२ मासों का भी अध्ययन कर लिया और उससे सम्बद्ध अधिमास को भी जान गये जिसे दिन को चन्द्रमा के नक्षत्रों से व्यक्त किया गया उस समय दिनों कि ३६६ दिन जिसका एक वर्ष कहा जाता है | पौराणिक ग्रंथ ऋग्वेद के अनुसार आर्यों ने लगभग ६००० हजार साल पहले इसका गहन अध्ययन कर एस्ट्रोलॉजी (ज्योतिष) को उन्नत रूप में निर्मित किया और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के अनुसार उनकी ओरायन से लगभग ४००० हजार शक सम्वत पहले का है |

अब अगर बात करें कि एक वर्ष में १२माह होते हैं तो इसका निर्धारण कैसे हुआ होगा या कैसे किया गया होगा और १२ माह हैं तो १२ माहों के नाम कैसे पड़े और १२ राशियाँ कैसे निर्मित हुई ? इसका उत्तर ऐसा है कि हमारे पृथ्वी कि परिधि ३६० डिग्री मानी गयी है और ३६० वां भाग एक अंश है और एक अंश का ६० वां भाग एक कला है और एक कला का ६० वां भाग एक विकला है और एक विकला का ६० वां भाग एक प्रतिविकला है और ३६० डिग्री को १२ से भागीत करने पर हमें प्रतिभाग ३० डिग्री कि प्राप्त होती है और यही हर राशी कि डिग्री होती है  एक राशी ३० डिग्री कि होती है और १२x३०=३६० डिग्री | अब आप लोगों के लिए यह समझना आसान होगा कि मेष राशी से लेकर मीन राशी तक (Means Aries to Pisces) इन सभी राशियों की  डिग्री ३० अंश या ३० डिग्री होती है |

अब बात करते हैं १२ माहों की, कि यह १२ माहों का नाम कैसे पड़ा? पौराणिक ग्रन्थ यजुर्वेद के अनुसार उस समय के आर्यों ने १२ माहों को चिन्हित करने के लिए उनका नामकरण इस प्रकार किया १.मधु,२.माधव्,३.शुक्र,४.शुचि,५.नमस्,६.नमस्य,७.इष,८.उर्ज,९.सहस्र, १०.तप, १०.तपस्य,१२. तपस रखे गए थे जिनका आगे चलकर पूर्णिमा में चन्द्रमा के नक्षत्रों के आधार पर १,चैत्र,२,वैशाख,३.ज्येष्ठ,४.अषाढ़,५.श्रावन,६.भाद्रपद,७,आश्विन,८.कार्तिक,९.मार्गशीष,१०.पौष,११.माघ, १२.फागुन रखे गये |

एस्ट्रोलॉजी का इतिहास बताने का यह एक प्रयास मात्र था, आशा करता हूँ कि आपको यह जानकारी पसंद आयी होगी अभी इसमें और भी बहुत सारी कड़ियाँ शेष रह गयी हैं जिनका उल्लेख मैं समय समय पर करता रहूँगा और जहाँ संभव हो सके बहुत ही आसान भाषा में जिससे कि आम व्यक्तियों को यह समझने में बहुत आसानी हो सके और यथा संभव हो सके तो इस लक्ष्मीपुत्र.कॉम वेबसाइट के माध्यम से आपको और भी रोचक जानकारी प्रस्तुत कर सकूँ और आपकी समस्या से संबंधित आपकी सहायता भी कर सकूँ | एस्ट्रोलॉजी के इतिहास में अब आज्ञा चाहता हूँ और यही कामना करता हूँ कि आपका जीवन धन-धान्य से उत्तम स्वास्थ्य से और अनगिनत खुशियों से परिपूर्ण रहे यही मेरी  मंगल कामना है |

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