चन्द्रमा की उत्पत्ति की कथा-CHANDRAMA KI UTPATTI Ki KATHA

चन्द्रमा की उत्पत्ति की कथा-CHANDRAMA KI UTPATTI Ki KATHA

चन्द्रमा की उत्पत्ति- हिन्दू धर्म में इस संसार के आकाशमंडल में सुंदर चमकीले चंद्रमा को देवताओं के सामान ही पूजनीय माना गया है। चंद्रमा के जन्म की कहानी पुराणों में अलग-अलग मिलती है।हिन्दू धर्म में ज्योतिष और वेदों में चन्द्र को मन का कारक कहा गया है। वैदिक साहित्य में सोम अर्थात चन्द्रमा का स्थान भी प्रमुख देवताओं में मिलता है। अग्नि ,इंद्र ,सूर्य आदि देवों के समान ही सोम की स्तुति के मन्त्रों की भी रचना ऋषियों द्वारा की गई है। 

चंद्रमा इन्हें अनके नामों से जाना जाता है जैसे कि चांद, चंद्र, सुधाकर, सुधांशु इत्यादि नामों से जानते हैं | पृथ्वी से यह एक मात्र ऐसा ग्रह है जो हमें सूर्य के बाद सबसे करीब दिखाई देता है। चन्द्रमा सबसे चमकीला दिखाई देता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो ऐसा माना जाता है कि चंद्रमा भले ही रोशनी लेता सूर्य से हो लेकिन वह सूर्य की तपती गर्म किरणों को अपने अन्दर समाहित कर हम तक शीतल करके उस रोशनी को पंहुचाता है और हमारी रातों को दुधिया चांदनी और ठंडक से रोशन करता है।

ज्योतिष में तो चंद्रमा का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है और हो भी क्यों न। दिन हो या रात, महिना हो या साल सब लगभग चंद्रमा पर ही तो निर्भर हैं।

 यहां तक जातक की कुंडली भी चंद्रमा की दशा के अनुसार ही बनती है। जिस भाव में चंद्रमा होता है उसी के अनुसार जातक की चंद्र राशि बनती है। चंद्रमा को मन का कारक भी माना जाता है। प्रतिपदा से लेकर अमावस्या पूर्णिमा सब तिथियां चंद्रमा पर निर्भर करती हैं।

चंद्रमा की चढ़ती और उतरती कलाओं से ही तिथियों का मास के कृष्ण और शुक्ल पक्षों का निर्धारण होता है। तो आइये जानते हैं इतने महत्वपूर्ण ग्रह चंद्रमा की कहानी क्या है? हमारे पौराणिक ग्रंथ इस बारे में क्या कहते हैं।

चंद्र देव की पौराणिक कथा

हिन्दू धर्म पुराणों में चंद्रमा के जन्म की कथा भी अलग-अलग मिलती है| अग्नि पुराण की कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना करने का विचार किया तो सबसे पहले उन्होंने अपने मानस पुत्रों की रचना की| इन्हीं मानस पुत्रों में एक थे ऋषि अत्रि। ब्रह्मा के पुत्र ऋषि अत्रि का विवाह हुआ महर्षि कर्दम की कन्या अनुसुइया से| देवी अनुसुईया के तीन पुत्र हुए जो दुर्वासा, दत्तात्रेय एवं सोम नाम से जाने गये। यह मान्यता है कि सोम का एक नाम चंद्र है|

हिन्दू धर्म के एक अन्य पुराण कथा अनुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि विस्तार का काम अपने मानस पुत्र अत्रि को सौंपा| इन्होंने इसके लिये अनुत्तर नामक तप शुरु कर दिया| तप करते समय एक दिन इनके नेत्रों से जल की कुछ बहुत ही तेजोमय बूंदे टपक कर  समस्त दिशाओं ने स्त्री रूप धारण कर पुत्र प्राप्ति की कामना हेतु इन प्रकाशमयी बूंदों को अपने गर्भ में धारण कर लिया|

 लेकिन अधिक समय तक दिशाएं इस गर्भ को धारण न कर सकीं और उसे त्याग दिया। फिर इस त्यागे हुए गर्भ को ब्रह्मा जी ने पुरुष रूप प्रदान किया जिसे इस संसार में चंद्रमा के नाम से ख्याति मिली। मान्यता है कि इन्हीं के तेज से पृथ्वी पर अनेक जीवन दायिनी औषधियों की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा जी ने इन्हें नक्षत्रों, वनस्पतियों, ब्राह्मण, तप आदि का स्वामीत्व सौंपा।

एक पौराणिक मान्यता के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया तो उस दौरान प्राप्त होने वाले १४ रत्नों में से एक चंद्रमा थे जिन्हें भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण किया। हालांकि माना यह भी जाता है कि ग्रह के रूप में चंद्रमा की उपस्थिति मंथन से पहले भी थी|

क्योंकि जब मंथन का मुहूर्त निकाला गया तो उस समय चंद्रमा और गुरू का शुभ योग बताया गया था। इस प्रकार मान्यता यह भी है कि चंद्रमा की विभिन्न कलाओं का जन्म अलग-अलग समय में हुआ।

पुराणों के अनुसार चन्द्र देव की उत्पत्ति

मत्स्य एवम अग्नि पुराण के अनुसार जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचने का विचार किया तो सबसे पहले अपने मानसिक संकल्प से मानस पुत्रों की रचना की। उनमें से एक मानस पुत्र ऋषि अत्रि का विवाह ऋषि कर्दम की कन्या अनुसुइया से हुआ जिस से दुर्वासा,दत्तात्रेय व सोम तीन पुत्र हुए। सोम चन्द्र का ही एक नाम है। 

पद्म पुराण में चन्द्र के जन्म का अन्य वृतान्त दिया गया है। ब्रह्मा ने अपने मानस पुत्र अत्रि को सृष्टि का विस्तार करने की आज्ञा दी। महर्षि अत्रि ने अनुत्तर नाम का तप आरम्भ किया। ताप काल में एक दिन महर्षि के नेत्रों से जल की कुछ बूंदें टपक पड़ी जो बहुत प्रकाशमय थीं।

इन दिशाओं ने स्त्री रूप में आ कर पुत्र प्राप्ति की कामना से उन बूंदों को ग्रहण कर लिया जो उनके उदर में गर्भ रूप में स्थित हो गया। परन्तु उस प्रकाशमान गर्भ को दिशाएं धारण न रख सकीं और त्याग दिया। उस त्यागे हुए गर्भ को ब्रह्मा ने पुरुष रूप दिया जो चंद्रमा के नाम से प्रख्यात हुए|

देवताओं,ऋषियों व गन्धर्वों आदि ने उनकी स्तुति की। उनके ही तेज से पृथ्वी पर दिव्य औषधियां उत्पन्न हुई| ब्रह्मा जी ने चन्द्र को नक्षत्र,वनस्पतियों,ब्राह्मण व तप का स्वामी नियुक्त किया|

स्कन्द पुराण के अनुसार जब देवों तथा दैत्यों ने क्षीर सागर का मंथन किया था तो उस में से चौदह रत्न निकले थे। चंद्रमा उन्हीं चौदह रत्नों में से एक है जिसे लोक कल्याण हेतु, उसी मंथन से प्राप्त कालकूट विष को पी जाने वाले भगवान शंकर ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया। पर ग्रह के रूप में चन्द्र की उपस्थिति मंथन से पूर्व भी सिद्ध होती है। 

स्कन्द पुराण के ही माहेश्वर खंड में गर्गाचार्य ने समुद्र मंथन का मुहूर्त निकालते हुए देवों को कहा कि इस समय सभी ग्रह अनुकूल हैं। चंद्रमा से गुरु का शुभ योग है।  तुम्हारे कार्य की सिद्धि के लिए चन्द्र बल उत्तम है। यह गोमन्त मुहूर्त तुम्हें विजय देने वाला है। अतः यह संभव है कि चंद्रमा के विभिन्न अंशों का जन्म विभिन्न कालों में हुआ हो। चन्द्र का विवाह दक्ष प्रजापति की नक्षत्र रुपी २७ कन्याओं से हुआ जिनसे अनेक प्रतिभाशाली पुत्र हुए। इन्हीं २७ नक्षत्रों के भोग से एक चन्द्र मास पूर्ण होता है। 

किस कारण से घटता बढ़ता है चंद्रमा

हिन्दू धर्म के ज्योतिष शास्त्र में कुल २७ नक्षत्र हैं | आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ब्रह्मा जी ने चंद्रमा को नक्षत्रों का स्वामी नियुक्त किया था और पौराणिक ग्रंथों में यह मान्यता भी मिलती है कि नक्षत्र जो कि २७ माने जाते हैं |

ये सभी २७ नक्षत्र प्रजापति दक्ष की कन्याएं थी जिनका विवाह चंद्रमा से हुआ इस कारण इन्हीं नक्षत्रों के भोग से एक माह संपन्न माना जाता है। सभी नक्षत्रों में रोहिणी से चंद्रमा का विशेष लगाव बताया जाता है। चंद्रमा का यह पक्षपात पूर्ण व्यवहार अन्य पत्नियों को पसंद नहीं था उन्होंने इसकी शिकायत अपने पिता प्रजापति दक्ष से की। उन्होंने चंद्रमा को क्षय होने का शाप दे दिया|

इससे तमाम वनस्पतियों पर भी संकट मंडराने लगा। तत्पश्चात स्वयं भगवान विष्णु ने बीच बचाव करते हुए समुद्र मंथन के दौरान चंद्रमा का उद्धार किया जिससे क्षय की यह अवधि पाक्षिक हुई। इसी घटना कारण चंद्रमा हर पंद्रह दिन के बाद घटता-बढ़ता रहता है।

गुरु वृहस्पति की पत्नी तारा से चंद्रमा का संबंध

चंद्रमा के गुरु देव गुरु बृहस्पति माने जाते हैं जब चंद्रमा उनके पास शिक्षा ग्रहण कर रहे थे तो उसी दौरान बृहस्पति की पत्नी तारा और चंद्रमा एक दूसरे के करीब आये। चंद्रमा की सुन्दरता देख गुरु पत्नी तारा उस पर मोहित हो गयी| और दोनों के मध्य प्रेम संबंध स्थापित हो गया उन दोनों के संयोग से बुध की उत्पत्ति हुई|

जब उन दोनों के प्रेम संबंध का उजागर हुआ तो  बृहस्पति और चंद्रमा आमने-सामने हो गये बाद में ब्रह्मा जी के हस्तक्षेप से मामला शांत हुआ और तारा को पुन: बृहस्पति को सौंपा गया| बृहस्पति ने बुध को अपने पुत्र रूप में स्वीकार किया| क्षत्रियों के चंद्रवंश की शुरुआत बुध से ही मानी जाती है| हालांकि कुछ कथाओं में यह भी बताया जाता है कि चंद्रमा ने तारा का अपहरण किया था। 

चन्द्रमा के कुछ अचूक उपाय

हिन्दू धर्म के ज्योतिष शास्त्र में बताया गया है कि यदि किसी जातक की कुंडली में चन्द्रमा पीड़ित है तो उसे शुभ करने के लिए कुछ कारगर उपाय बताये गए हैं |चूँकि चन्द्रमा मन का कारक है और कुंडली में चन्द्र ग्रह की अशुभता का मनुष्य के मन पर पूरा प्रभाव पड़ता है। कुंडली में चंद्र दोष के कारण गृह क्लेश, मानसिक विकार, माता—पिता की बीमारी, दुर्बलता, धन की कमी जैसी समस्याएं सामने आती हैं। सोमवार चंद्रदेव का दिन है। ऐसे में उनसे जुड़े तमाम दोषों को दूर करने और चंद्र कृपा पाने के लिए जरूर करें ये चमत्कारी उपाय |

१.चंद्र देवता की कृपा पाने के लिए दूध में काले तिल मिलाकर शिवलिंग का रुद्राभिषेक करें। शिव की उपासना से चंद्र देवता से संबंधी दोष दूर हो जाते हैं और उनकी कृपा मिलने लगती है।

२.सोमवार के दिन चंद्र कृपा पाने के लिए चांदी के किसी पात्र में गंगाजल, दूध, चावल और बताशा या चीनी डालकर सूर्यास्त के बाद चंद्रमा को अघ्र्य दें।

३.चंद्र की कृपा पाने के लिए सोमवार के दिन दूध और चावल की खीर बनाकर गरीब, असहाय लोगों में दान करें।

४.सोमवार या पूर्णिमा के दिन दूध, चावल, सफेद कपड़े, चीनी, सफेद चंदन और दही का दान करने से चंद्र कृपा प्राप्त होती है।

५.पूर्णिमा के दिन चंद्र देवता का दर्शन करें और उसकी रोशनी में बैठकर चन्द्र-मंत्र  का जाप करना चाहिये।

६.चंद्र दोष को दूर करने और उनकी कृपा पाने के लिए चंद्र देवता के निम्न मंत्रों का जाप काफी शुभ असरकारक साबित होता है।

चन्द्रमा का वैदिक मंत्र
ॐ ऐं क्लीं सोमाय नम:।।

चंद्र बीज मंत्र
ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्रमसे नम:।।

चंद्रमा को नमस्कार करने का मंत्र
दधिशंख तुषाराभं क्षीरॊदार्णव संभवम्।
नमामि शशिनं सॊमं शम्भोर्मकुट भूषणम्॥

७.सिर्फ धार्मिक पूजा-पाठ के उपाय ही नहीं बल्कि व्यावहारिक रूप से भी तमाम उपाय करके हम चंद्र की कृपा पा सकते हैं। चंद्रमा की कृपा पाने के लिए प्रतिदिन अपनी माता के पैर छुएं।

2 thoughts on “चन्द्रमा की उत्पत्ति की कथा-CHANDRAMA KI UTPATTI Ki KATHA

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *