ज्योतिष राशियों की उत्पत्ति एवं उनका परिचय-Jyotish Rashiyon Ki Utpatti Evam Unka Parichay

ज्योतिष राशियों की उत्पत्ति एवं उनका परिचय-Jyotish Rashiyon Ki Utpatti Evam Unka Parichay

ज्योतिष राशियों की उत्पत्ति– हिन्दू धर्म में ज्योतिष का विशेष महत्त्व है| फिर वो चाहे वार्षिक पंचांग का निर्माण हो| और हिन्दू धर्म में ज्योतिष शास्त्र की सहायता से ही वार्षिक पंचांग का निर्माण होता आ रहा है| ज्योतिष के बिना हम वार्षिक पंचांग की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं|

भारत का ज्योतिष शास्त्र विश्व के प्राचीनतम ज्योतिष शास्त्रों में से एक माना गया है| इस आधुनिक युग में भी भारतीय ज्योतिष को प्रमुखता दी जाती है| अगर आप विश्लेषण करेंगे तो पायेंगे कि ज्योतिष के क्षेत्र में प्रथम स्थान भारतीय ज्योतिष का है|

और इसका प्रमाण आपको इन्टरनेट पर बहुत ही आसानी से मिल जायेगा| जिससे कि आपको ज्योतिष पर अधिक विश्वास हो जायेगा| केवल भारत देश में ज्योतिष की १५० के आस-पास ज्योतिष विद्या प्रचलित है| इनमे से १२ प्रमुख ज्योतिष विद्या है| इन १२ प्रमुख ज्योतिष विद्याओं का प्रयोग एक विशेष प्रकार की विद्या में किया जाता है| जिसे कि कुंडली विद्या कहते हैं|

कुंडली विद्या और १२ राशि

कुंडली विद्या के तीन प्रमुख भाग हैं| कुंडली विद्या के अनुसार जब किसी भी व्यक्ति का जन्म होता है| तब इस सृष्टि के प्रमुख नौ ग्रहों (जिनकी उत्पत्ति की कथा पिछले लेख में वर्णित है), चन्द्रमा के सभी २७ नक्षत्रों के आधार पर १२ राशियों का निर्माण होता है| तात्पर्य यह है कि किसी भी व्यक्ति के जन्म के समय इन सभी नौ ग्रहों की स्थिति, नक्षत्र, तिथि और समय के आधार पर उस व्यक्ति की जन्म कुंडली का निर्माण होता है|

और इसी के आधार पर उस व्यक्ति की सम्पूर्ण जीवनवाली के बारे में विस्तार पूर्वक बताया जाता है| और आसन भाषा में समझने के लिये हम इसे दो भागों में विभक्त कर लेते हैं| जिसमें से पहली राशि चन्द्र राशि और दूसरी राशि सूर्य राशि| इन दोनों को ज्योतिष में कुंडली विश्लेषण के लिये प्रमुख मान्यता दी गयी है|

राशियों की डिग्री या अंश का निर्धारण

जैसा कि आप जानते हैं की हमारी पृथ्वी की परिधि ३६० अंश की मानी गयी है| और ३६० वां भाग एक अंश है और एक अंश का ६० वां भाग एक कला है| और एक कला का ६० वां भाग एक विकला है| एक विकला का ६० वां भाग एक प्रतिविकला है| ३६० डिग्री को १२ से भाग देने पर हमें प्रतिभाग ३० डिग्री की प्राप्त होती है| और यही हर राशी की डिग्री या अंश  होती है|

एक राशि ३०अंश या ३०डिग्री की होती है और १२ राशिx३०अंश=३६०अन्श| आसान भाषा में १२x३०=३६० डिग्री | अब आप लोगों के लिए यह समझना आसान होगा कि मेष राशि से लेकर मीन राशि तक इन सभी राशियों की  डिग्री ३० अंश या ३० डिग्री होती है |

राशियों का विस्तार परिचय

जब चन्द्रमा ३६० डिग्री की एक परिक्रमा करता है तो उसके इस परिक्रमा पथ पर २७ भिन्न-भिन्न प्रकार के तारा समूह बनते हैं| और आकाशगंगा में यही २७ तारा समूह को नक्षत्र-चक्र के नाम से जाने जाता है| पौराणिक कथा के अनुसार चन्द्रमा का विवाह राजा दक्ष की २७ कन्याओं से हुआ था और इन्हें ही चन्द्रमा के २७ नक्षत्र कहा जाता है|

और इन २७ नक्षत्रों में चन्द्रमा प्रत्येक नक्षत्र की परिक्रमा १३अंश२०कला पर एक दिन में पूरा करता है| इन सभी २७ नक्षत्रों के अलग-अलग गुण-धर्म हैं| और इन्हीं २७ नक्षत्रों को १२ अलग-अलग नक्षत्रों या भाग में विभक्त किया गया है| और यही १२ नक्षत्रों के छोटे समूह १२ राशि कहलाते हैं|

ज्योतिष में एक राशि ३०अंश की होता है और ज्योतिष में १२ राशियाँ होती हैं| दोनों को साथ में गुणा करने पर ३०अंशx१२राशियाँ=३६०अंश| अर्थात एक राशि ३०अंश की होता है| भारतीय ज्योतिष शास्त्र में इन्हें मेष राशि से लेकर मीन राशि का नाम दिया गया है|

चन्द्र राशि का परिचय    

चन्द्र राशि को सूक्ष्मता से पहचानने के लिए सम्पूर्ण आकाश-मण्डल की दूरी को २७ भागों में विभक्त किया गया| और प्रत्येक भाग का नाम एक-एक नक्षत्र रखा| अब सूक्ष्मता से समझने के लिए प्रत्येक नक्षत्र के चार भाग किए, जो कि चरण कहलाते हैं।

चन्द्रमा का गोचर या संचरण एक राशि में ढाई दिन का होता है और एक राशि ३०अंश की होता है| उस आधार पर निकला जाये तो १२राशिx२.५दिन=३०| यानि की चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा ३० दिनों में पूरी करता है| पर विद्वानों के मतानुसार चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा २७.३ दिन में पूरी करता है|

जब चन्द्रमा प्रत्येक राशि में २.५ दिन का संचरण करता है और उसके बाद वो अलग राशि में पहुँच जाता है| जिसका अर्थ होता है कि चन्द्रमा जिस राशि पर विराजमान हो जाता है वही उस व्यक्ति की जन्म राशि माना जाता है| जिसे कि उस व्यक्ति की चन्द्र राशि कहा जाता है|

 १२ राशियों का नामकरण

अब आपके मन में यह प्रश्न उठ रहा होगा कि इन सभी १२ राशियों का नामकरण कैसे किया गया| इसका उत्तर है कि आकाशगंगा को ३६०अंश में विभक्त किया गयी है और प्रति ३०अंश का भाग एक राशि होता है| चन्द्रमा के २७ नक्षत्र हैं और २.२५नक्षत्र की एक राशि होता है (१२राशिx२.२५नक्षत्र=२७नक्षत्र)| अर्थात एक राशि नक्षत्र में कुल ९ चरण होते हैं| और प्रत्येक राशि में कुल ९ नामाक्षर होते हैं|

इन सभी १२ राशियों का सम्बन्ध तो चन्द्रमा से है| अब बात यह आती है की इन सभी १२ राशियों का नामकरण हुआ कैसे? तो इसका उत्तर है आकाशगंगा की ३६०अंश को १२ भागों में विभक्त किया गया और प्रत्येक भाग को ३०अंश प्राप्त हुआ| पर इनका कोई चिन्ह तो था नहीं तो इन्हें चिन्हित करने के लिये ज्योतिष महाऋषियों ने प्रत्येक नक्षत्र के समूह आकृति, आकार और इनके स्वभाव  के अनुसार इनका नामकरण किया|

और इन ज्योतिष के प्रखंड महाविद्वान महाऋषियों ने परिचित वस्तुओं के आधार पर उनकी आकृति, स्वाभाव और आकर के आधार पर इन १२ राशियों का नाम दिया| जो कि इस प्रकार है और ज्योतिष विद्वानों के नामकरण के अनुसार इन सभी १२ राशियों में सबसे पहला नाम और पहली राशि को मेष राशि का नाम दिया गया और इसका पहचान चिन्ह भेड का दिया गया|

और मेष राशि के नक्षत्र में कुल नौ चरण होते हैं अतः इसके अंतर्गत आने वाली राशि अक्षर  नामावली इस प्रकार है चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, और अ| अब तो आपको पूर्ण रूप से स्पष्ट हो गया होगा कि किस प्रकार से ज्योतिष की यह १२ राशियाँ बनी हैं|

१२ राशियों का चिन्ह एवं नामाक्षर

उपरोक्त में आपने जाना कि हिन्दू धर्म के शास्त्र में १२ राशियों का जन्म या उनकी उत्पत्ति या उनका निर्माण कैसे हुआ| अब आपको हम विस्तार पूर्वक सभी १२ राशियों के राशि चिन्ह और उनके सभी ९ नामाक्षर के बारे में विस्तृत विवरण दे रहे हैं| जो कि इस प्रकार है-

१. मेष राशि चिन्ह – भेड़ 

राशि के अक्षर -चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ होते हैं|

२. वृष राशि चिन्ह – बैल 

राशि के अक्षर – ई, उ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो नाम अक्षर के होते हैं|

३. मिथुन राशि चिन्ह – पुरुष और नारी का युग्म और पुरुष के हाथ में नारी को धारण करने का चिन्ह और नारी के हाथ में वीणा धारण किए हुए का चिन्ह 

राशि के अक्षर -का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, ह होता है|

४. कर्क राशि चिन्ह – केकडा 

राशि के अक्षर – ही, हू, हे, हो, डा, डी, डु, डे, डो होता है|

५. सिंह राशि चिन्ह – सिंह की आकृति 

राशि के अक्षर -मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे होता है|

६. कन्या राशि चिन्ह – एक लड़की नाव में बैठी हुई और उसके हाथ में धान व अग्नि के साथ का चिन्ह

राशि के अक्षर – ढो, प, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो होता है।

७. तुला राशि चिन्ह – एक पुरुष तराजू हाथ में लिए 

राशि के अक्षर -र, री, रू, रे, रो, ता, ति, तू, ते होता है|

८. वृश्चिक राशि चिन्ह – बिच्छू 

राशि के अक्षर – न, नी, नू, ने, नो, या, यि, यू होता है|

९. धनु राशि चिन्ह – एक पुरुष अपने हाथों में धनुष लिये हुआ और साथ में घोड़ा 

राशि के अक्षर – य, यो, भा, भि, भू, ध, फा, ढ, भे होता है|

१०. मकर राशि चिन्ह – मृग के सामान मुख यानि हिरण के समान मुख 

राशि के अक्षर – भो, जा, जी, खी, खू, खे, खो, गा, गी होता है|

११. कुंभ राशि चिन्ह – कंधे पर कलश लिये हुआ एक पुरुष 

राशि के अक्षर – गू, गे, गो, स, सी, सू, से, सो, द होता है|

१२. मीन राशि चिन्ह – दो मछलियां गोल बनी हुई  एक के मुख पर दूसरे की पूंछ  लगकर 

राशि के अक्षर – दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, च, ची होता है|

आशा करता हूँ कि हिन्दू धर्म के अनुसार ज्योतिष निर्मित इन सभी १२ राशियों की उत्पत्ति की जानकारी आप सभी को पूर्ण रूप से विस्तार पूर्वक प्राप्त हुई होगी| यह हमारा एक प्रयास था जिससे की हम आपको इन सभी राशियों का इतिहास बता सकें| आगे के लेख में हम आपको इन सभी १२ राशियों की एक-एक कर के विस्तृत जानकारी प्रदान करने का पूर्ण प्रयास करेंगे जैसे कि इन राशियों के जातक या व्यक्ति कैसे होते हैं इत्यादि|

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