त्रिपुरासुर का वध

नमस्कार आज मैं आपके समक्ष एक बहुत ही अद्भुत और रोमांचक पौराणिक कथा प्रस्तुत कर रहा हूं जिसे पढ़कर आप स्वयं में बहुत ज्यादा रोमांचित  हो जाएंगे यह पौराणिक कथा आधारित है  त्रिपुरासुर के वध की इस त्रिपुरासुर का वध  भगवान शिव ने किया था और इस त्रिपुरासुर के वध  की विस्तृत कथा महाभारत के कर्ण पर्व पर मिलती है इस पौराणिक कथा का आरंभ होता है त्रिपुरासुर के पिता तारकासुर के वध से इसका वध भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय जी के द्वारा होता है अपने पिता तारकासुर की वर्ग को देखकर पद को वध को देखकर तीनो भाई अत्यंत दुखी हो जाते हैं और प्रतिशोध की भावना लिए तीनों एक साथ संकल्पित हो जाते हैं कि अब हमें कि अब हमें  भगवान ब्रह्मा देव को प्रसन्न करना है और तीनो भाई भगवान को प्रसन्न करने के लिए एक जंगल चले जाते जहां पर वह तीनों भाई कई हजार वर्षों तक अत्यंत और तपस्या कर भगवान ब्रह्मा को प्रश्न करते हैं उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा उन तीनों भाइयों को वरदान देने के लिए उनके समस्त प्रकट होते हैं तब ब्रह्म देव को देखकर तीनो भाई  भगवान ब्रह्मा से अमरता का वरदान मांगते हैं| परंतु भगवान ब्रह्मा उन तीनों भाइयों को अमरता का वरदान देने से मना कर देते हैं और कहते हैं कि तुम तीनों कोई ऐसी शर्त रखो जो कि अलग अकल्पनीय हो और अत्यंत कठिन हो और तुम्हारी मृत्यु उसी शर्त के पूरा होने पर ही हो यह सुनकर तीनो के तीनो भाई बहुत सोच विचार करने लग गए तब अत्यंत विचार करने के बाद तीनों भाइयों ने ब्रह्मा जी से यह वरदान मांगा कि हे प्रभु आप हम तीनों भाइयों के लिए अलग से तीन पुरों का निर्माण कर दें और जब तीनों पुरियां एक पंक्ति में एक कतार में हो और उस समय कोई अत्यंत शांत क्रोधित अवस्था में हो अकल्पनीय रथ और असंभव बाण के सहारे हम तीनों भाइयों को मारना चाहे तभी हमारी मृत्यु हो पाये | तब ब्रम्हा जी ने तीनों भाइयों को तथास्तु कहा |

ब्रम्हा जी से वरदान प्राप्त कर उन्हें जो वरदान स्वरुप तीन पुरियां प्राप्त होने थी उसका निर्माण भगवान विश्वकर्मा जी द्वारा तीनों भाइयों के लिए अलग-अलग तीन पुरियों (नगर)  का निर्माण किया | बड़े भाई  तारकाक्ष के लिए स्वर्णपुरी, मंझले भाई कमलाक्ष के लिए रजतपुरी और छोटे भाई विद्युन्माली के लिए लौह्पुरी का निर्माण भगवान विश्वकर्मा द्वारा किया गया | तीनों भाइयों के  सम्मलित बल के कारण इन्हें त्रिपुरासुर कहा जाता था| इन तीनों भाइयों ने अपनी पुरियों में रहते हुए सातों  के सात लोको  को अति प्रताड़ित और आतंकित कर दिया था, तीनो भाई जहां भी जाते हैं वहां पर सभी सज्जनों को सताते रहते और तीनों इतने बलशाली थे कि इनके बल के सामने देवता भी निर्बल  हो गए और अपने बल के दम पर तीनों भाइयों ने मिलकर देवताओं को स्वर्गलोक  से बाहर निकाल दिया | सभी देवताओं ने अंत तक अपनी सारी शक्ति  लगा दिया लेकिन कोई भी तीनों भाइयों की शक्तियों के आगे टिक  ना सका और अत्यंत बुरी  हार का सामना करना पड़ा | देवताओं को तीनों भाइयों से छुप  कर रहना पड़ रहा था और देवताओं ने  बहुत सोच विचार करने के बाद भगवान शिव की शरण में जाने का निर्णय लिया, भगवान शिव ने कहा आप सभी लोग मिलकर के प्रयास करो तब देवताओं ने कहा हे प्रभु हम सभी देवता अपना पूरा सामर्थ्य शक्ति सब कुछ लगा कर के देख चुके हैं, पर हम सभी देवता तीनों भाइयों की शक्तियों के आगे टिक नहीं पाए वह हमसे भी कहीं अधिक बलशाली उन्हें हरा पाने का बल हमारे पास नहीं है प्रभु| तब भगवान शिव ने कहा अगर ऐसी बात है तो मैं तुम्हें अपना आधा बल प्रदान  करता हूँ और मेरे आधे बल को अपने बल से मिलाकर सामूहिक प्रयास करके देखो | लेकिन भगवान शिव के आधे बल को संभाल पाने में सभी देवता गण असमर्थ रहे यह देख कर भगवान शिव ने स्वयं त्रिपुरासुर के वध का संकल्प लिया | सभी देवताओं ने अपना आधा-आधा बल  भगवान शिव को समर्पित कर दिया,अब भगवान शिव के लिए अद्भुत-अकल्पनीय रथ और बाण कि तैयारी होने लग गयी, जिससे कि उस रथ पर सवार होकर उन तीनों भाइयों का वध किया जा सके | त्रिपुरासूर के अंत के लिए उसके शर्त के अनुसार रथ  की तैयारी होने लगी जिससे कि रथ  पर सवार होकर रणस्थल पर पहुंचकर त्रिपुरासुर का वध किया जा सके और भगवान शिव ने एक असंभव अद्भुत अकल्पनीय अविश्वसनीय रथ का निर्माण किया | इसके लिए भगवान शिव ने पृथ्वी को ही अपना रथ  बनाया तथा सूर्य और चंद्र दोनों को रथ के पहिए बनाएं और सृष्टा  उस रथ के सारथी बने भगवान विष्णु बाण बने और मेरु पर्वत धनुष तथा बासुकीनाथ  उस धनुष की डोर बने | इस प्रकार यह संभव और अकल्पनीय रथ तैयार हुआ और तीनों भाइयों के वध  की सारी लीला रची गई जिस समय भगवान शिव का पर सवार हुए तब उसके सभी  देवताओं  के द्वारा संभाला गया रथ भी डगमगाने  लग गया  यह देखकर भगवान विष्णु वृषभ बनकर रथ से जा जुड़े | उन घोड़ों और वृषभ कि पीठ पर सवार होकर महादेव ने उन तीनों भाइयों के नगर को देखा और  पाशुपत अस्त्र का संधान करने लगे जब तीनों भाइयों के पुरों को  एकत्र होने का संकल्प करने लगे| भगवान शिव के अमोघ बाण में भगवान विष्णु, यम, वायु और अग्नि चारों का समाहन था | अभिजित  नक्षत्र में  भगवान शिव ने तीनों पुरियों के एक सामान होते ही अपने अमोघ बाण से  तीनों पुरियों को जलाकर भस्म कर दिया और शर्त वचन के अनुसार उन तीनों भाइयों का अंत हुआ संहार हुआ | तबसे भगवान शिव को त्रिपुरान्तक कहा जाने लगा |

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