बृहस्पति देव की उत्पत्ति की कथा-Brihaspati Dev Ki Utpatti Ki Katha

बृहस्पति देव की उत्पत्ति की कथा-Brihaspati Dev Ki Utpatti Ki Katha

बृहस्पति देव की उत्पत्ति-भारतीय ज्योतिष शास्त्र में सभी नौ ग्रहों में सबसे विशिष्ट स्थान केवल मात्र एक ग्रह हैं जिन्हें यह प्राप्त है| वो हैं गुरु ग्रह या गुरु बृहस्पति| गुरु  बृहस्पति ज्योतिष शास्त्र में बहुत अहमियत रखते हैं। इन्हें देवताओं का गुरु बनाया गया है| इसी कारण से इन्हें देव गुरु कहा जाता है।

ज्योतिष के राशिचक्र में धनु और मीन राशियों का स्वामी भी गुरु बृहस्पति को माना जाता है। ये ज्ञान व बुद्धि के दाता माने जाते हैं। इनकी कृपा से ही जातकों को उचित सलाह मिलती है। इनकी कृपा दृष्टि से ही वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग मिलता है।

इनके शुभ होने से किसी भी व्यक्ति का व्यवसाय फलता-फूलता है। और जातक अपनी बुद्धि का सदुपयोग कर सही निर्णय लेने में समर्थ होता है। यह सब जानकर आपके मन में सब प्रश्न तो आया ही होगा कि जिस ग्रह को देवताओं का गुरु पद प्राप्त है| उनकी उत्पत्ति कैसे हुई होगी अथवा उनका जन्म कैसे हुआ होगा?

ग्रहों कि उत्पत्ति की श्रृंखला में आगे बढ़ते है| और अब आपको सभी नौ ग्रहों में सबसे ज्यादा प्रभावशाली सबसे ज्यादा पूजे जाने वाले ग्रह बृहस्पति की उत्पत्ति की कथा बताने का प्रयास करते हैं|

बृहस्पति ग्रह की उत्पत्ति की पौराणिक कथा 

खगोल शास्त्रियों विज्ञानियों के नज़रिये से भले ही बृहस्पति ग्रह इनके लिये ज्यूपिटर नाम का एक ग्रह मात्र है| जो अपने आकार में अन्य ग्रहों से बड़ा दिखता है| लेकिन हिंदू पौराणिक धर्म ग्रंथों में सभी प्रमुख ग्रहों जिन्हें हम नवग्रह भी कहते हैं के संदर्भ में अलग-अलग ग्रंथो के अनुसार इन सभी नौ ग्रहों की उत्पत्ति अथवा जन्म की कई पौराणिक कथाएं मिलती हैं|

हिन्दू पौराणिक धर्म ग्रंथो में इनकी उत्पत्ति की भी अपनी कथा मिलती है| ये शुक्र ग्रह (जिसे वीनस के नाम से जाना जाता है) के समकालीन हैं| दोनों ने अपनी आरंभिक शिक्षा एक ही गुरु से हासिल की लेकिन चूंकि शिक्षक स्वयं बृहस्पति के पिता थे| इसलिये भेदभाव को महसूस कर शुक्र ने उनसे शिक्षा ग्रहण करने का विचार त्याग दिया। बृहस्पति ग्रह का जन्म कैसे हुआ और कैसे उन्हें देवताओं के गुरु की पदवी प्राप्त की इसकी पौराणिक कथा कुछ इस प्रकार है।

भगवान ब्रह्मा जिन्होंने इस सृष्टि कि रचना की उनके मानस पुत्रों में से एक थे ऋषि अंगिरा जिनका विवाह स्मृति से हुआ| इन्हीं के यहां उतथ्य और जीव नाम के दो पुत्र हुए| दोनों पुत्रों में से जीव बहुत ही बुद्धिमान व स्वभाव से बहुत ही शांत थे| माना जाता है कि इन्होंने अपनी सभी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली थी|

जीव अपने पिता से शिक्षा प्राप्त करने लगे इनके साथ ही भार्गव श्रेष्ठ कवि भी इनके पिता ऋषि अंगिरा से शिक्षा ग्रहण कर रहे थे| लेकिन अंगिरा अपने पुत्र जीव की शिक्षा पर बहुत अधिक ध्यान देते थे और कवि को नज़रंदाज करते इस भेदभाव को कवि ने महसूस किया और उनसे शिक्षा पाने का अपना निर्णय बदल लिया।

वहीं अपने पुत्र जीव को अंगिरा शिक्षा देते रहे| जीव जल्द ही पिता से सम्पूर्ण ज्ञान ग्रहण कर वेद शास्त्रों के ज्ञाता हो गये| वेद शास्त्रों के ज्ञाता होने के पश्चात जीव ने प्रभाष क्षेत्र में शिवलिंग की स्थापना कर भगवान शिव की कठोर साधना आरंभ कर दी| इनके कठिन तप से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने जीव को साक्षात दर्शन दिये और कहा कि मैं तुम्हारे तप से बहुत प्रसन्न हूं|

तब भगवान शिव ने जीव से कहा अब तुम अपने ज्ञान से देवताओं का मार्गदर्शन करो| उन्हें धर्म दर्शन व नीति का पाठ पढ़ाओ| अब से इस जगत में तुम देवगुरु ग्रह बृहस्पति के नाम से ख्याति प्राप्त करोगे| इस प्रकार भगवान शिव शंकर की कृपा से इन्हें देवगुरु की पदवी एवं नवग्रहों में स्थान प्राप्त हुआ|

देव गुरु बृहस्पति की तीन पत्नियाँ थी जिनका नाम शुभा, तारा एवं ममता था| ममता से देव गुरु बृहस्पति को भारद्वाज एवं कच नामक पुत्रों की प्राप्ति हुई|

कुछ अन्य कथाओं में यह भी वर्णित है कि चंद्रमा बृहस्पति के शिष्य थे| इनसे शिक्षा प्राप्त करते-करते बृहस्पति की पत्नी तारा और चंद्रमा के बीच प्रेम संबंध स्थापित हो गया और दोनों के मिलन से तारा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई| यह कोई और नहीं स्वयं बुध ग्रह माने जाते हैं|

देव गुरु बृहस्पति और चंद्रमा में बुध को लेकर टकराव की स्थिति पैदा हो गई थी| देव गुरु बृहस्पति बुध को अपना पुत्र बता रहे थे तो चंद्रमा बुध को अपना पुत्र| दोनों के टकराव के बीच में ब्रह्मा जी के हस्तक्षेप से दोनों में समझौता हुआ और तारा ने बुध को चंद्रमा का पुत्र बताया लेकिन समझौते के अनुसार तारा को वापस देव गुरु बृहस्पति को सौंप  दिया| बृहस्पति ने बुध को अपने पुत्र की तरह माना और नैसर्गिक रूप से बुध ग्रह में गुरु बृहस्पति का ज्ञान भी और तीव्र बुद्धि भी प्राप्त हुई|

कुंडली में गुरु ग्रह दोष से बचने का अचूक उपाय

अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में यदि गुरू चारों केंद्र में से किसी एक केंद्र में स्थित हो जाये तो उस जातक को केंद्राधिप दोष लगता है| अर्थात गुरू जिस भाव में रहता हैं उसका फल कम हो जाता है| जिसके कारण उस व्यक्ति के कई कार्य विलंब से होते हैं| गुरु ग्रह के दोष से पीड़ित जातक किसी योग्य गुरू से गुरू दीक्षा लेकर, गुरु की पूजा वंदना कर, गुरु के द्वारा दिये गये मंत्र का जप करने से पर गुरू ग्रह के दोष से मुक्ति मिल सकती है|

इसके साथ ही भगवान लक्ष्मीनाराण का पूजन भी इसमें सहायक होता हैं । गुरु यदि किसी भी व्यक्ति की जन्म कुंडली के तीसरे, छटवें या बारहवें भाव में हो तो भी गुरु कृपा मिलने में कठिनाई होती है| अगर गुरू की दृष्टि जन्म कुंडली के पांचवे, सातवें और नवम भाव में हो तो जातक को शुभ फल की प्राप्ति होती हैं ।


यदि किसी की कुंडली में गुरु ग्रह का दोष हो जाए तो उस व्यक्ति को शादी और भाग्य जैसी समस्याओं का सामना करना पडता है| और यदि अनूकुल स्थितियां होते हुए भी आपके विवाह में समस्या उत्पन्न हो रही है| तो ऐसे व्यक्ति को गुरुवार के दिन का बिना नमक का व्रत उपवास करना अति लाभकारी सिद्ध होता हैं ।

गुरू ग्रह का पूजन इस प्रकार करें

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गुरु ग्रह दोष के निवारण के लिए जातक को अपने गुरु की पूजा अर्चना के साथ गुरू मंत्र का चिंतन और जप करना चाहिए| गुरूवार के दिन भगवान बृहस्पति देव की पूजा का विधान है| इस दिन पूजा करने से धन, विद्या, पुत्र तथा मनोवांछित फल की प्राप्ति होने के साथ परिवार मे सुख और शांति समृद्धि बनी रहती है| साथ ही जिस किसी के विवाह में बाधाएं उत्पन्न हो रही हो उन्हें गुरूवार का व्रत अनिवार्य रूप से करना चाहिये|

इस दिन पूजा में एक समय ही बिना नमक का भोजन करें । पीले वस्त्र धारण करें, पीले पुष्प की माला भगवान श्री लक्ष्मीनारायण को अर्पित करना चाहिये| भोजन में भी चने की पीली दाल का करें और इस दिन नमक का परहेज करना चाहिये| भगवान श्री लक्ष्मीनारायण की पूजा में पीले रंग का फूल, चने की दाल, पीले कपड़े और पीले चन्दन का प्रयोग करने से गुरु और भगवान की शीघ्र कृपा के साथ मनोवांछित फल भी मिलता है|

गायत्री मंत्र को गुरु मंत्र कहा जाता है अगर किसी जातक ने गुरु नहीं बनाया है तो वे भी सूर्य भगवान को अपना गुरु मानकर गायत्री मंत्र का नित्य 108 बार जप करने से गुरू ग्रह दोष सहित सभी समस्याओं की निराकरण स्वतः ही हो जाता है| गायत्री मंत्र इस प्रकार है|

 ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् |

इस मंत्र का भी जप कर गुरु कृपा प्राप्त कर सकते हैं|

गुरू ग्रह दोष से पीड़ित व्यक्ति को गुरुवार के दिन नहाते वक्त पानी में एक चुटकी हल्दी, एवं गंगाजल डालकर स्नान करने के बाद 108 बार “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करने के बाद, इसी मंत्र का उच्चारण करते हुए शुद्ध केसर का तिलक लगाए और केले के वृक्ष में जल अर्पित कर उसकी धूप- दीप से पूजा करे, आपकी सभी समस्या दूर होगी|

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