माँ अष्टलक्ष्मी वर्णन-Maa Ashtlaxmi Varnana

माँ अष्टलक्ष्मी का वर्णन

माँ अष्टलक्ष्मी का विस्तृत वर्णन – जैसा कि आप पूर्व में माँ लक्ष्मी कि जन्म कथा पढ़ चुके हैं कि माँ लक्ष्मी का जन्म कैसे हुआ है और प्रायः सभी लोग जानते हैं कि माँ लक्ष्मी इस सम्पूर्ण जगत की जननी हैं इस धरती पर और समस्त ब्रम्हाण्ड में उपस्थित समस्त धन-सम्पदा, वैभव विलास, धातु,तत्व इत्यादि समस्त की अधिष्ठात्री देवी हैं|

और इस संसार में उपस्थित समस्त प्रकार की गतिविधियों के संचालन के लिए माँ लक्ष्मी के साथ-साथ उन्होंने अपने आठ स्वरूपों का भी सृजन किया और अपने हर एक स्वरुप को इस संसार के संचालन लिये कार्यभार प्रदान किया |

माता लक्ष्मी के आठ स्वरूपों का वर्णन इस प्रकार है –

  1. आदि लक्ष्मी
  2. धन लक्ष्मी
  3. विद्या लक्ष्मी
  4. धान्य लक्ष्मी
  5. धैर्य लक्ष्मी
  6. संतान लक्ष्मी
  7. विजय लक्ष्मी
  8. राज लक्ष्मी

आदि लक्ष्मी| Adi Lakshmi

माँ अष्टलक्ष्मी में यह आदि लक्ष्मी माँ लक्ष्मी का प्रथम स्वरुप है | आदि का अर्थ होता है प्रारंभ आसान भाषा में आप इसे मूल कह सकते हैं कि किसी भी वास्तु का मूल, जैसे कि मनुष्य को ही ले लीजिये | हम मनुष्य अपने मूल से अनभिज्ञ हैं और पुराणों के अनुसार हम सभी परमपिता परमेश्वर कि संतान हैं और मनुष्य को अपने मूल का ज्ञान होना ही आदि लक्ष्मी कहा जाता  है | और यही परम ज्ञान माना गया है |

ठीक उसी प्रकार माँ आदि लक्ष्मी हैं जिन्हें इस संसार के संचालन में मनुष्य जाति कि पवित्रता और आनंद का कार्य प्राप्त हुआ है  | आदि लक्ष्मी का वास केवल ज्ञानी पुरुषों में ही माना गया है, जिसके पास माँ आदि लक्ष्मी हैं वस्तुतः उस व्यक्ति के पास ज्ञान भी है |

धन लक्ष्मी | Dhana Lakshmi

माँ अष्टलक्ष्मी का दूसरा स्वरुप धन लक्ष्मी माँ – इस संसार में धन के बिना जीवन-यापन कर पाना किसी भी मनुष्य के लिए असंभव है | और बगैर धन के मानवीय भोग-विलास कि वस्तुओं का क्रय कर पाना भी असंभव है, इस संसार में मानवीय जीवन में जीवन-यापन के लिए आधार केवल धन मात्र ही है और माँ धन लक्ष्मी को इस संसार में धन संचालन का कार्यभार प्रदान किया गया है |

इसी धन कि लालसा में मनुष्य संघर्ष-घोरसंघर्ष करता है क्यों कि धन के माध्यम से ही मनुष्य अपनी सांसारिक इक्छाओं कि पूर्ति-आपूर्ति कर पता है और मानवीय जीवन में इसी धन के लिए सच-झूठ, साम-दाम, दण्ड-भेद, लूटपाट, इत्यादि समस्त प्रकार के कर्म मनुष्य करता है |

विद्या लक्ष्मी | Vidya Lakshmi

माँ अष्टलक्ष्मी का तृतीय स्वरुप-माँ विद्या लक्ष्मी| विद्या दायिनी माँ सरस्वती के बारे में तो ज्ञात ही होगा, माँ सरस्वती जिन्हें इस संसार में उपस्थित समस्त मनुष्यों को उनके ज्ञान प्राप्ति के लिए यह कार्यभार प्रदान किया गया है | इस चराचर जगत में जो भी ज्ञान है वो माँ सरस्वती द्वारा ही प्राप्त होता है मनुष्य उन विधाओं को सीख कर वह ज्ञान प्राप्त करता है और इस संसार में ज्ञान कि कोई सीमा नहीं है, ज्ञान असीमित है |

मनुष्य अपने जीवन काल में जितना भी ज्ञान अर्जन कर ले वह नाम मात्र ही रहता है है और यदि आप किसी बड़े महान पुरुष से मिले और वार्तालाप करें तो आप पाएंगे कि वह ज्ञानी पुरुष अपने आपको यही कहता पायेगा कि वह अभी भी सीख रहा है उसके पास आप कभी भी ज्ञान का घमंड करते हुये नहीं पायेंगे |

अपितु वह ज्ञानी पुरुष यह कहेगा कि उसको आपसे भी कुछ सीखने को मिला है, ऐसे व्यक्ति के पास स्थायी सरस्वती का वास होता है | अपने कभी  लक्ष्मी माँ और सरस्वती माँ के चित्र को देखा होगा तो आप देख सकेंगे कि लक्ष्मी माँ ज्यादातर कमल में पानी के ऊपर बैठे रहती हैं ।

क्योंकि  पानी अस्थिर है यानी माँ  लक्ष्मी भी पानी की तरह अस्थिर और  चंचल हैं और  विद्या दायिनी देवी सरस्वती माँ  एक पत्थर पर स्थिर रूप से विराजमान रहती हैं । मनुष्य के जीवन में जब विद्या  आती है तो जीवन में स्थिरता आती है । विद्या का भी हम दुरुपयोग कर सकते हैं और सिर्फ पढ़ना ही किसी मनुष्य का लक्ष्य हो जाए तब भी वह विद्या लक्ष्मी नहीं बनती। पढ़ना है, फिर जो पढ़ा है उसका उपयोग करना है तब वह विद्या लक्ष्मी है।​

धान्य लक्ष्मी | Dhanya Lakshmi

माँ अष्टलक्ष्मी का चतुर्थ स्वरुप-माँ धान्य लक्ष्मी, इनके बगैर इस संसार में किसी भी मनुष्य का भरण-पोषण असंभव है । क्योंकि अगर आपके पास धन तो है लेकिन कुछ भी अन्न न हो तो आप कुछ खा नहीं सकते दाल-चावल, रोटी-सब्जी, घी, नमक, चीनी या अन्य खाद्य पदार्थ  खा नहीं सकते। इसका मतलब धन लक्ष्मी तो है मगर धान्य लक्ष्मी का अभाव है । अपने देखा होगा कि  गांवों में  खूब धान्य उपलब्ध होता है ।

अपने देखा होगा कि गाँव के निवासी  किसी को भी दो-चार दिन तक खाना खिलाने में कभी संकोच नहीं करते हैं । उनके पास धन भले ही ना हो पर धान्य होता है । गाँवों के लोग खूब अच्छे से खाते भी है और खिलाते भी है । शहर के लोगों की तुलना में ग्रामीणों द्वारा खाया जाने वाला भोजन गुणवत्ता और मात्रा में श्रेष्ठ है ।

गाँववालों की पाचन शक्ति शहरवालों से बहुत  अच्छी होती है । दुनिया में भोजन हर व्यक्ति के लिए आव्यशक है ।भोजन को बर्बाद नहीं करना या खराब नहीं करना चाहिये । कई बार भोजन जितना बनता है उसमें आधे से ज्यादा फेंक देते हैं औरों को भी नहीं देते । ये नहीं करना। धन के साथ-साथ धान्य का सम्मान करना ही धान्य लक्ष्मी है।

जो भी व्यक्ति धान्य का पूर्ण रूप से सम्मान करता है अनावश्यक धान्य कि बर्बादी नहीं करता उसके जीवन में कभी भी धान्य कि कमी नहीं रहती है और माँ धान्य लक्ष्मी का आशीर्वाद सैदव उस व्यक्ति पर बना रहता है | आप सभी से निवेदन है कि कृपया आप लोग अन्न का आदर-सम्मान करें और कभी भी अनावश्यक धान्य कि बर्बादी न करें |

धैर्य लक्ष्मी | Dhairya Lakshmi

माँ अष्टलक्ष्मी का पंचम स्धैवरुप-धैर्य लक्ष्मी, मनुष्य की अनमोल संपत्ति है धैर्य, जिसके पास धैर्य है उसके पास धैर्य-लक्ष्मी है और यही कार्यभार माँ धैर्य-लक्ष्मी को प्रदान किया गया है | यदि आपके पास  घर में सब है, धन है, धान्य है, सब संपन्न है मगर आप डरपोक हैं । अक्सर देखा जाता है कि धन-संपन्न परिवार के बच्चे बड़े डरपोक होते हैं ।

अपने यह भी देखा होगा कि जो लोग नौकरी करते हैं वह लोग अपने अधिकारियों से डरते हैं । व्यापारी हो तो पुलिस इंस्पेक्टरों से डरता  है । आप अधिकारियों से पूछेंगे कि आपको  किस प्रकार के सहायक  पसंद  हैं?  जो आपके सामने डरता है या जो धैर्य से आपके साथ कार्य करता हैं?

जो आपसे डरता है वह आपको कभी सच नहीं बताएगा, झूठी कहानी बता देगा। ऐसे व्यक्ति के साथ आप काम नहीं कर पायेंगे । आप उन्ही सहायक को पसंद करते हिं जो धैर्य और ईमानदारी से आपके साथ रहें और बात करें । सवाल यह भी है कि आप आपके अधिकारियों से डरते क्यों हो ?  क्योंकि हम अपने जीवन से जुड़े नहीं है ।

हमको ये नहीं पता है की हमारे भीतर ऐसी शक्ति है एक दिव्यशक्ति है जो हमारे साथ हमेशा के लिए है। यह धैर्य लक्ष्मी की कमी हो गई। धैर्य लक्ष्मी होने से ही जीवन में प्रगति हो सकती है नहीं तो नहीं हो सकती। जिस मात्रा में धैर्य लक्ष्मी होती है उस मात्रा में प्रगति होती है। चाहे बिजनेस में हो चाहे नौकरी में हो। धैर्य लक्ष्मी की आवश्यकता होती ही है।

संतान लक्ष्मी | Santana Lakshmi

माँ अष्टलक्ष्मी का षष्टम स्वरुप- संतान लक्ष्मी, यह नाम सुनकर ही आप समझ सकते हैं कि माँ को इस संसार में मनुष्यों को संतान प्राप्ति का कार्यभार प्रदान किया गया है | बगैर संतान के मनुष्य का जीवन खुशियाँ विहीन है बगैर संतान के किसी भी दम्पति का जीवन अपूर्ण है | दाम्पत्य जीवन कि सबसे बड़ी पूँजी संतान ही होती है |

और यही संतान दाम्पत्य जीवन कि प्यार की पुंजी होते हैं, जिनसे हमारा प्यार का संबंध होता है और संतान का भाव होता है तब वो संतान लक्ष्मी होती है । जिस संतान से तनाव कम होता है या नहीं होता है वह संतान लक्ष्मी।। जिस संतान से सुख, समृद्धि, शांति होती है वह है संतान लक्ष्मी और जिस संतान से झगड़ा, तनाव, परेशानी, दुःख, दर्द, पीड़ा हुआ वह संतान संतान लक्ष्मी नहीं होती ।​

विजय लक्ष्मी | Vijaya Lakshmi

माँ अष्टलक्ष्मी का सप्तम स्वरुप- विजय लक्ष्मी, जिन लोगों के पास संसार कि समस्त प्रकार की साधन, सुविधाएँ होती हैं, परन्तु मानव जीवन बगैर सफ़लता के भी तो अपूर्ण है और सबकुछ रहते हुये अगर किसी मनुष्य को किसी भी काम में उसे सफलता नहीं मिलती । उस मनुष्य के पास सब-कुछ होने के बाद भी वह मनुष्य किसी भी काम में हाथ लगाये और वह काम चौपट हो जाता है या उसका  काम होगा ही नहीं तो उस व्यक्ति के जीवन में विजय लक्ष्मी की कमी है ।

ऐसे भी यदि आप उस व्यक्ति को  बाजार में कुछ भी सामग्री लेने भेजेंगे तो बस उसे ही नहीं मिलती । वाहन से जायेगें तो वह बिगड़ जाएगी । टैक्सी से अगर बाजार पहुँच भी गए तो सभी दुकानें बंद  मिलती है । यह देखकर  आपको लगेगा कि इससे ज्यादा अच्छा होता मैं खुद ही बाजार जाकर यह काम कर लेता ।

जो भी व्यक्ति छोटे से छोटा काम भी नहीं कर पाते है उसके पास  विजय लक्ष्मी की बहुत भारी कमी होती है । वह व्यक्ति कुछ न कुछ बहाना बनाएगा या बहाना ना भी हो तो उसके सामने ऐसी परिस्थितियाँ हो जाएगी कि उसे किसी भी काम में सफलता नहीं मिलती यह विजय लक्ष्मी की कमी है ।

राज लक्ष्मी | Raj Lakshmi

माँ अष्टलक्ष्मी का अष्टम स्वरुप- राज लक्ष्मी, आप इसे राज लक्ष्मी कहें या भाग्य लक्ष्मी कहें दोनों का आशय एक ही है – राज करना किसी भी सत्ता पर राज करना । अपने देखा होगा कि कई बार ऐसा होता है कि कोई मंत्री उच्चतम पद पर विराजमान होता है पर उसके उच्चत्तम पद पर होने के बाद भी उसकी एक भी नहीं चल पाती है, वह  कुछ भी बोलता है पर उसकी कोई सुनने वाला नहीं होता ।

ऐसा भी कई बार होता है कि किसी कंपनी में मालिक तो है पर उसकी कोई सुनता ही नहीं है। उस कंपनी में मालिक की बात को कोई  नहीं सुनेगा मगर एक बाबू की बात को सब सुनते और मानते भी हैं, वह पर वह बाबू ही कंपनी को  चलाएगा ।

किसी भी सत्ता पर शासन करना राज करना ही राज लक्ष्मी है | अपने देखा होगा कि किसी भी  ट्रेड यूनियन के प्रमुख के पास जितनी  राज लक्ष्मी है शायद ही किसी शहरी मिल -मालिक के पास होती  है । मिल में तो वो सिर्फ ट्रेड यूनियन प्रमुख होता है मगर उसके पास राज लक्ष्मी है वो वह शासन चला सकता है । शासन करने की शक्ति को ही राज लक्ष्मी है ।

अष्टलक्ष्मी सारांश

यह आठ प्रकार की धन-लक्ष्मी सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में  इन आठ धन-लक्ष्मी की अधिक या कम मात्रा में होती है । हम इन अष्टलक्ष्मी का कितना सम्मान करते हैं, उनका कितना और किस प्रकार उपयोग करते हैं यह  हमारे ऊपर निर्भर करता है ।

इन अष्टलक्ष्मी की अनुपस्थिति को-अष्ट दरीद्रता कहा जाता है । चाहे लक्ष्मी है या नहीं, नारायण को अभी भी अनुकूलित किया जा सकता है । अगर अपने नारायण को साध लिया तो अपने माँ लक्ष्मी को साध लिया क्योंकि नारायण दोनों के हैं – लक्ष्मी नारायण और दरिद्र नारायण!

दरिद्र नारायण को परोसा जाता है और लक्ष्मी नारायण की पूजा की जाती है । पूरे जीवन का प्रवाह दरिद्र नारायण से लक्ष्मी नारायण तक – दुख से समृद्धि तक, जीवन में सूखेपन से दैवीय अमृत तक जा रहा है ।