रक्षाबंधन–भाई-बहन के प्रेम का अटूट पवित्र पर्व

मैं लक्ष्मीपुत्र पर आप सभी का सहृदय अभिनन्दन करता हूँ | आज मैं आपके समक्ष भाई-बहन के पवित्र और अटूट स्नेह बंधन कि कहानी प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे हम रक्षाबंधन के नाम से जानते है और बहुत सारे पाठकगण यह भी जानना चाहते होंगे कि भाई-बहन के मध्य यह जो रक्षा का पवित्र बंधन और त्यौहार है इसके पीछे कि क्या कहानी है, चलिए जानते हैं |

Raksha Bandhan Img

       इसी प्रकार एक और पौराणिक कहानी है जिसके अनुसार देवताओं और असुरों के मध्य बहुत द्वंद युद्ध चल रहा था वह युद्ध इतना घमासान था कि समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा था दोनों पक्ष विजयी होने के लिए कई वर्षों तक संघर्ष करते रहे और अंततः असुरों ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर ही ली, अब हारने के पश्चात देवराज इंद्र निराश हो कर देवगुरु वृहस्पति के पास गये तब देवगुरु वृहस्पति ने देवराज इंद्र को श्रवण मास कि पूर्णिमा तिथि से रक्षा संस्कार करने को कहा और मंत्रो के द्वारा उस रक्षा संस्कार को पूर्ण कर उसकी एक पोटली बना कर देवराज इंद्र को दिया | जब फिर से देवराज इंद्र असुरों के विरुद्ध युद्ध के लिए जा रहे थे तब उनकी पत्नी शचि ने उस रक्षा पोटली को देवराज इंद्र के हाथ में बांध दिया और वह रक्षा पोटली के कारण देवराज इंद्र असुरों के विरुद्ध युद्ध जो जीतने में सफल हो गये और तब से यह रक्षा संस्कार का पवित्र पर्व प्रारंभ हो गया |

इसी प्रकार एक और पौराणिक कहानियां जिसके अनुसार एक बार की बात है जब राजा बलि अपने पास सब कुछ होते हुए भी भगवान विष्णु की कृपा के लिए व्याकुल रहते थे ऐसे में उनके मन में विचार आया के श्री हरि विष्णु जी सारे संसार में सारे ब्रह्मांड में सभी के ऊपर में अपनी दया कृपा करते हैं और दर्शन देते हैं पर मेरे साथ ही ऐसा क्यों है कि सब कुछ ठीक हो सब कुछ अच्छा करने के बाद भी मुझे भगवान विष्णु के दर्शन नहीं होते तब ऐसे में राजा बलि ने हट कर लिया कि चाहे जो कुछ भी हो जाए अब मैं भगवान विष्णु को अपनी तपस्या से प्रसन्न करके उनसे वरदान मांगूंगा ऐसे में राजा बलि ने बहुत ही एक ही घोर तपस्या की परिणाम स्वरूप भगवान विष्णु को उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर राजा बलि को वर  देने के लिए आना पड़ा तब राजा बलि ने भगवान विष्णु से कहा कि आप दिन रात सुबह शाम आठों पहर सिर्फ और सिर्फ मेरे ही माल में रहेंगे और मेरे साथ में रहेंगे भगवान विष्णु तो उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वरदान देने के लिए उसे तथास्तु कह देते हैं और फिर भगवान विष्णु शिवसागर को छोड़कर राजा बलि के यहां पर विराजमान हो जाते हैं जब माता लक्ष्मी को यह बात पता चलती है तब माता लक्ष्मी बहुत ही ज्यादा चिंतित हो जाती हैं और उन्हें यह समझ नहीं आ रहा है कि अब क्या किया जाए तब ऐसे में माता लक्ष्मी के पास में आते हैं और माता लक्ष्मी उन्हें सारा वृतांत सुनाते हैं यह सुनकर नारद जी ने माता लक्ष्मी को एक उपाय सुझाया नारद जी ने कहा यदि आप भगवान विष्णु को वापस क्षीरसागर में लाना चाहती हैं तो आप एक कार्य करें आप राजा बलि के पास में जाएं और उन्हें एक रक्षा सूत्र बांधकर अपना भाई बना ले | नारद जी की बात मानकर माता लक्ष्मी राजा बलि के पास जाकर उन्हें रक्षा सूत्र बांधकर अपना भाई बना लेती हैं और राजा बलि से उपहार में अपने पति को वापस मांगती है क्योंकि राजा बलि एक बहन के रक्षा सूत्र में बंध गए थे इसलिए वह विवश थे और उन्होंने माता लक्ष्मी के कहे अनुसार भगवान विष्णु को उनके साथ वापस क्षीर सागर भेज दिया तब से भाई और बहन के बीच रक्षा का यह पवित्र त्यौहार मनाया जाने लगा

अगर देखा जाये तो यह त्यौहार किसी भी धर्म जाति के बंधन में कभी भी नहीं बंधा हुआ था और यह त्यौहार भाई-बहन के अटूट प्रेम और बहन कि रक्षा का प्रतीक है |

       आप सभी को  भाई-बहन के अटूट प्रेम के पवित्र पर्व कि हार्दिक शुभकामनाएं हैं |

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