राहु-केतु की उत्पत्ति की कथा-Rahu-Ketu Ki Utpatti Ki Katha

राहु-केतु की उत्पत्ति की कथा-Rahu-Ketu Ki Utpatti Ki Katha

राहु-केतु की उत्पत्ति- भारतीय ज्योतिष शास्त्र में ये दोनों ऐसे ग्रह हैं| जो देने पर उतर आयें तो इस संसार की धन-सम्पति भी कम पड़ जाये| पर राहु-केतु को इस संसार में केवल इनका नाम ही पर्याप्त है किसी भी व्यक्ति के अन्दर भय पैदा करने के लिये|

इन दोनों ग्रहों को भारतीय ज्योतिष शास्त्र में केवल छाया ग्रह मन जाता है| और प्राचीन-काल से लेकर आज के आधुनिक-काल के वैज्ञानिक या खगोलशास्त्री राहु-केतु को किसी भी प्रकार के ग्रह का दर्जा नहीं दिये हैं|

विज्ञान और खगोलशास्त्र की दृष्टि में भले ही ये दो ग्रह कोई मायने नहीं रखते हैं| पर भारतीय  ज्योतिष शास्त्र में राहु-केतु को बहुत प्रभावशाली ग्रह माना जाता है| जन्म-काल से वक्री राहु-केतु छाया ग्रह माने जाते हैं| एक राशि में यह दोनों ग्रह लगभग १८ महीने तक रहते हैं| और अपना राशि चक्र १८ वर्षों में पूरा करते हैं|

राहु ग्रह को जहां शक्ति, शौर्य, दुर्भाग्य, राजनीति, भय, शत्रुता, पाप-कर्म, कलंक, धोखाधड़ी और छल-कपट आदि के कारक माने जाता है|  तो वहीं पर  केतु ग्रह को समस्त प्रकार का मनोरोग, विष जनित रोग, कोढ़, हृद्य रोग, टोने-टोटके, भूत-प्रेत, आकस्मिक दुर्घटना आदि के कारक माने जाता है|

राहु-केतु के छाया ग्रह के रूप में स्थापित होने की कथाएं हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में मिलती हैं| राहु-केतु के जन्म की या उनकी उत्पत्ति की क्या कथा है| क्यों इन दोनों ग्रहों की सूर्य और चंद्रमा से इतनी घोर शत्रुता है और क्यों राहु-केतु , सूर्य-चन्द्रमा को अपने ग्रहण का ग्रास बनाते हैं? और क्यों ये दोनों ग्रह सबसे शक्तिशाली ग्रह माने गए हैं चलिये जानते हैं और इस रहस्य से आपको अवगत कराने का प्रयास करते हैं|

कैसे हुआ राहु-केतु का जन्म

हिन्दू धर्म ग्रंथों की पौराणिक कथा के अनुसार राहु-केतु के जन्म की कथा कुछ इस प्रकार से है|

अपने प्रत्येक वर्ष होली का त्यौहार तो मनाया ही होगा| और इस त्यौहार की उत्पत्ति की नीव जुडी है असुरों के राजा हरिण्यकश्यप से| इनके बारे में तो सभी जानते हैं| हरिण्यकश्यप असुरों के एक-मात्र ऐसे राजा हुए थे, जिन्हें कोई नर, देव, दानव, तीनों भगवन ब्रम्हा, विष्णु और शिव  यहाँ तक की कोई पशु भी नहीं मार सकता था|

ऐसे असुर राजा को मारने के लिये और उनके पुत्र जो कि भगवान श्री हरि विष्णु जी के परम भक्त प्रह्लाद थे| उनकी रक्षा के लिये स्वयं भगवान श्री हरि विष्णु जी ने देव, दानव, मानव, पशु से भिन्न नरसिंह अवतार धारण किया| इन्हीं असुर राजा हरिण्यकश्यप की एक पुत्री थी| जिसका नाम सिंहिका था|  सिंहिका का विवाह विप्रचिती नामक एक असुर से हुआ|

ऐसा बताया जाता है कि कुछ अन्य कथाओं में विप्रचिती को महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी दनु की संतान भी बताया जाता है | और सिहिंका को हरिण्यकश्यप की बहन| लेकिन हिन्दू धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक कथा में इसकी मान्यता हर कहानी में मिलती है| कि विप्रचिती और सिंहिका का विवाह हुआ था|

विप्रचिती और सिहिंका के मिलन से उनका एक पुत्र हुआ जो अपने जन्म-काल से ही बहुत ही बुद्धिमान और बलशाली था| कुछ कथाओं में उनके पुत्र का नाम राहु बताया जाता है| तो कुछ अन्य कथाओं में स्वरभानु| सबका अपना-अपना मत है|

पर हमारा मत अनुसार यह राक्षस स्वरभानु था| क्योंकी  स्वरभानु अर्थात राहू को असुरों में सबसे बुद्धिमान, शक्तिशाली और मायावी माना जाता था| और यह भी उल्लेख मिलता है कि स्वरभानु अपनी माया शक्ति से कोई सा भी रूप धारण करने में सक्षम था|

यह भी मान्यता है कि देवताओं और असुरों में अमृत प्राप्ति के लिये समुद्र मंथन की संधी हुई थी| और इस संधि के तहत वासुकि नाग को मंथन की रस्सी और मंदराचल पर्वत को मथनी बनाते हुए क्षीरसागर का मंथन किया गया|

क्षीरसागर के मंथन से कुल १४ रत्न समुद्र से निकले| और इन १४ रत्नों सहित महर्षि धनवंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर उपस्थित हुए| अब अमृतपान को लेकर देवताओं और असुरों में अराजकता जैसा माहौल होने लगा था| दोनों पक्ष अमृतपान को ले कर आपस में झगड़ने लगे इस स्थिति को भांपते हुए भगवान श्री हरि विष्णु ने मोहिनी नाम की एक अप्सरा का रूप धारण किया|

और असुरों को अपने मोहपाश में बांधकर देवताओं को अमृतपान कराना शुरु कर दिया| विप्रचिती और सिंहिका के पुत्र राहु जिसे सिंहिकेय भी कहा जाता है| वो देवताओं की इस चाल को समझ गये उन्होंने देवताओं का रूप धारण किया फिर स्वयं सूर्य व चंद्रमा के बीच बैठ गये| जब भगवान विष्णु ने उन्हें अमृतपान करा रहे थे तो सूर्य चंद्रमा दोनों को राहु पर संदेह हो गया और भगवान विष्णु को इस बारे में सूचित किया|

भगवान विष्णु ने यह जानने के बाद तुरंत अपने सुदर्शन चक्र से राहु का सिर को उसके धड से अलग कर दिया| लेकिन तब तक देर हो चुकी थी अमृत अपना काम कर चुका था| अमृत पान कर अमर हुए सिर को राहू और धड़ को केतु का नाम दिया गया|

यह मान्यता है कि ब्रह्मा ने राहु को सर्प का शरीर दिया तो केतु को सर्प का सिर| अपना भेद उजागर होने के कारण राहु-केतु, सूर्य और चंद्रमा से अपनी शत्रुता दिखाते हैं और मौका मिलते ही उन पर ग्रहण लगाते हैं| और ये दोनों ग्रह यदि किसी भी व्यक्ति की जन्म कुंडली में किसी भी घर में सूर्य या चन्द्रमा के साथ बैठ जाते हैं तो सूर्य और चन्द्रमा दोनों के प्रभाव को कम देते हैं|

रहस्यमयी राहु

भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार राहु और केतु को नवग्रहों में छाया ग्रह कहा जाता है| कहीं-कहीं पर इसे मारक ग्रह भी कहा गया है| राहु का साया ऐसा होता जो एक बार किसी भी व्यक्ति पर यदि पड़ जाए तो व्यक्ति को अन्धकार में ला खड़ा करता है|

ज्योतिष शास्त्र में राहु ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जो किसी भी व्यक्ति को अर्श से फर्श पर और फर्श से अर्श पर ला देता है| अगर राहु देने पर आ जाये तो इस संसार की सारी धन-सम्पति भी कम पड़ जाये| ऐसा है राहु ग्रह| यदि इस संसार में किसी भी प्रकार की कोई भी घटना यकायक हो रही है तो इसके पीछे सिर्फ राहु होता है|

राहु और केतु इन दोनों ग्रहों का प्रभाव बिल्कुल रहस्यमयी होता है| इसलिए कई बार इसका प्रभाव समझ में नहीं आता है| यदि किसी की जन्म कुंडली में राहु का प्रभाव नकारात्मक होता है तो हर हाल में उस व्यक्ति को नुकसान पहुंचता है|

राहु का प्रभाव

यह दोनों ऐसे ग्रह है जो किसी भी ग्रह के शुभ प्रभाव को भी छाया की तरह कम कर देता है| राहु जीवन के जिस भाग पर प्रभाव डालता है उसमें विचित्र प्रकार की उलझन पैदा कर देता है| जिससे उबर पाना उस व्यक्ति के लिए मुश्किल और नामुमकिन हो जाता है|

इसके दुष्प्रभाव के कारण लोगों में सुसाइड tendency आ जाती है| और ऐसे व्यक्ति छोटी से छोटी बात को अपने ऊपर लाद कर बहुत बड़े झगडे कर लेते हैं| ऐसे व्यक्तियों को किसी की बात सुनना बिलकुल भी पसंद नहीं होता है|

राहु का लक्षण

राहु ग्रह के प्रभाव के लक्षण यह होते हैं कि राहु अपने प्रभाव से व्यक्ति में नकारात्मक उर्जा भर देता है| जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति की सोच कभी भी स्थिर नहीं होती| वह एक काम के पूरा होने के पूर्व दूसरा काम करना शुरू कर देता है, जिसका परिणाम यह होता है कि उस व्यक्ति को सफलता मिलते-मिलते रह जाती है|

वह कभी भी किसी भी कार्य में लम्बे समय तक नहीं बने रह पता है| कुछ समय के अंतराल में अपना कार्य या पेशा बदलने लगता है| ऐसा व्यक्ति अपने किसी भी कार्य में फोकस नहीं कर पता है| पल प्रतिपल उसके मन में नये-नये विचार आते रहते हैं|

उस व्यक्ति का खान-पान दूषित हो जाता है| इसके अतिरिक्त राहु से प्रभावित व्यक्ति की जीवनशैली और दिनचर्या अनियमित हो जाती है| वह व्यक्ति बिना किसी कारण के देर रात तक जगता रहता है और व्य्यर्थ में अपना कीमती समय नष्ट करता रहता है|

राहु के इस प्रभाव का निवारण

राहु के इस प्रभाव को समाप्त करने के का रामबाण उपाय|

  • रोज सुबह सूर्योदय के पूर्व अमृत वेला में उठें और नित्य क्रिया से निवृत होने के बाद तुलसी के पत्ते का सेवन करना चाहिये|
  • प्रतिदिन स्नान करने के बाद सफेद चदन अथवा रक्त चंदन (लाल चन्दन) को अपने माथे, कंठ और नाभि में लगाना चाहिए|
  • प्रतिदिन भोजन करते समय सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि व्यक्ति का मुख पूरब की ओर हो राहु|

राहु का अकस्मात् प्रभाव

राहु ग्रह किसी भी व्यक्ति के कामकाज और रोजगार पर ऐसे असर डालता है कि राहु के प्रभाव में आया हुआ व्यक्ति अचानक धन कमाने के चक्कर में पड़े रहता है| वह व्यक्ति जल्दी से धन कमाने के चक्कर में जुए, सट्टेबाजी और लाटरी के चक्कर में आकंठ डूब जाता है| किसी भी प्रकार का काम हो उस काम में बार-बार बदालव आता रहता है| यानि कि स्थिरता का अभाव रहता है। राहु के इस प्रभाव को दूर करने का रामबाण उपाय|

  • शनिवार के दिन पिंजरे में कैद पक्षियों को आजाद करवाएं और ऐसा जितना हो सके उतने शनिवार करें| इस उपाय से बहुत पुण्य मिलता है और कर्ज से भी मुक्ति मिलती है|
  • गले में तुलसी की माला धारण करना चाहिए|
  • घर अथवा दुकान में रखी हुई अनावश्यक चीजों को तुरंत हटा देना चाहिये|

राहु का पारिवारिक जीवन पर प्रभाव

राहु ग्रह किसी भी व्यक्ति के पारिवारिक जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डालता है| राहु के इस प्रभाव से उस व्यक्ति का पारिवारिक जीवन कभी भी खुशहाल नहीं रहता है| उसके घर परिवार में अनावश्यक झगडे होते रहते हैं|

उस व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में अक्सर तनाव बना रहता है| पति-पत्नी दोनों के बीच बिना किसी वजह के वाद-विवाद, तना-तनी लगे रहता है| जरा-जरा सी बात भी चुभने लगती है| उस व्यक्ति की एक से अधिक विवाह होने की संभावना बनी रहती है|

पारिवारिक संपत्ति या तो उसके हाथ नहीं लगती है या उस व्यक्ति को अपनी पारिवारिक संपति के लिये कोर्ट के मुकदमें का सामना करना पड़ता है| उस व्यक्ति के  संतान की  उत्पति में विलंब होता है और पत्नी द्वारा जानबूझकर गर्भपात करा लेना अथवा उसकी संतान समस्या का कारण बनता है|

इस प्रकार का प्रभाव यदि किसी व्यक्ति को राहु ग्रह से मिल रहा हो तो उसे यह उपाय पूरी श्रद्धा और संकोच के अवश्य करना चाहिये|

ये है राहु के इस प्रभाव के रामबाण उपाय

  • प्रतिदिन सूर्योदय के समय नियमित रूप से  सूर्य देव को जल अर्पित करें|
  • सूर्यास्त होने के पश्चात् ही राहु देव के मन्त्रों का जाप करें| और जाप करते समय अपना सर काले रंग के रूमाल या काले कपडे से ढँक कर ही करें|
  • राहु देव का मंत्र है ‘ॐ रां राहवे नमः’ मंत्र जाप की संख्या १०८ जाप या एक माल १०८ मनके की|
  •  सोमवार के दिन सफेद चंदन शिवलिंग पर अर्पित करें|

इन उपायों को निरंतर करते रहें और जितना संभव हो सके माँ गायत्री की प्रातःकाल में पूजा करें है प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें| याद रखें यदि आप राहु के प्रभाव की शुभता चाहते हैं तो गायत्री मंत्र का जाप केवल दिन के समय पर ही करें| कभी भी भूलकर भी गायत्री मंत्र का जाप संध्याकाल अथवा रात्रिकाल में ना करें|

आशा करता हूँ राहु और केतु की उत्पत्ति की यह कथा आपको पसंद आयी होगी| यदि आपको यह कथा पसंद आयी है तो कृपया कमेंट के माध्यम से हमें अवगत करायें| नवग्रह की श्रृंखला का यह अंतिम लेख था| अब आने वाले लेख में आपको इन सभी नव ग्रहों से सम्बंधित और भी बहुत सारी महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्रदान करेंगे| इस लेख को पढने के लिये आपका बहुत-बहुत धन्यवाद|


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