वास्तु शास्त्र की उत्पत्ति का वर्णन-Vastu Shastra Ki Utpatti Ka Varnan

वास्तु शास्त्र की उत्पत्ति का वर्णन-Vastu Shastra Ki Utpatti Ka Varnan

वास्तु शास्त्र की उत्पत्ति- वास्तु के बारे में आप सभी ने सुना ही होगा, पर क्या आप जानते हैं कि इस वास्तु का मतलब क्या होता है | क्या है यह वास्तु-शास्त्र और यह वास्तु-शास्त्र आया कहां से है | इसका इतिहास क्या है और इसका अर्थ क्या होता है | वास्तु शास्त्र की उत्पत्ति वस्तु से हुई है |

वस्तु का तात्पर्य है जो है अथवा जिसकी सत्ता है वही वस्तु वास्तु वस्तु का ज्ञान कराने वाला ज्ञान ही वास्तु शास्त्र होता है | वास्तु शास्त्र को मात्र भवन निर्माण कला सिखाने वाला एक शास्त्र मानते हैं परंतु वास्तु भवन निर्माण के साथ-साथ भवन में की जाने वाली सभी वस्तुओं के स्थान के साथ-साथ वस्तु के दिशा का भी हमें ज्ञान करवाता है |

वास्तु का संबंध है वासुदेव से या यूं कहें कि वास्तु पुरुष से | तो क्या है यह वास्तु पुरुष? इस वास्तु पुरुष के बारे में कहा गया है कि उसका शरीर रंग एकदम स्वर्ण के जैसा (स्वर्ण का अर्थ है सोना) है, उस वास्तु पुरुष के शरीर से लालिमा निकलती है |वास्तु पुरुष के कानों में श्रेष्ठ कुंडल है और वह सौभाग्यशाली और सुंदर है |

उसके हाथ में दंड है और वह सभी मनुष्यों के लिए आश्चर्य एवं विषयवत मध्य हो विशेष प्रणाम करता है |

जो कोई भी व्यक्ति वास्तु पुरुष को प्रणाम करता है वह उसके भय को नष्ट कर देते है | हिन्दू धर्म में जिस प्रकार सृष्टि निर्माण के देवता ब्रम्ह देव सृष्टि के पालक देवता विष्णु और इस सृष्टि के संहार के देवता महादेव | धन के देवता कुबेर जल के देवता वरुण है |उसी प्रकार यह प्राचीन मान्यता है कि वास्तु देवता अथवा वास्तु देव प्रत्येक छोटे अथवा बड़े भूखंड में वास करते है |

वास्तु के उत्पत्ति की कहानी

मत्स्य पुराण के एक कहानी के अनुसार एक राक्षस अंधकासुर और भगवान शंकर के मध्य युद्ध के बारे में तो आपने सुना ही होगा | उस युद्ध के समय अत्यंत श्रम करने के कारण शंकर भगवान के पसीने की एक बूँद से एक महाभूत उत्पन्न हुआ | यह  देखकर राक्षस एवं देवता गण  अत्यंत भयभीत हो गए | अपने भय से मुक्ति के लिए देवता और राक्षस गण ब्रम्ह देव जी के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि है ब्रह्मदेव हम सभी महाभूत से अत्यंत भयभीत हैं |

आप ही बताएं कि हम क्या करें उन सभी की प्रार्थना सुनकर ब्रह्माजी मुस्कुराए और उन्होंने कहा वह भी इतना भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है | आप समस्त देव और राक्षस गण मिलकर इस महाबली महाभूत को पकड़ कर अधोमुख अर्थात सर नीचे और पैर ऊपर कर के इसे पृथ्वी  पर फेंक दो और निर्भय हो जाओ |सब ने मिलकर उस युक्ति से उसे पृथ्वी पर फेंक दिया |

पृथ्वी पर गिरते हुये उस महाभूत ने  ब्रह्मा जी से प्रार्थना की कि हे प्रभु आपने इस संपूर्ण जगत का सृजन किया है मुझ निरपराध को आप के आदेशानुसार पृथ्वी पर अधोमुख  करके गिरा दिया गया है आप मेरे बारे में भी कुछ विचार करें |

यह सुनकर ब्रह्मा जी ने उस महाभूत  को वास्तु देव का नाम दिया और कहा जो भी मनुष्य किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य करे फिर वह चाहे भवन का निर्माण हो गांव का निर्माण हो नगर का हो किसी दुर्ग का निर्माण हो अथवा किसी जलाशय का निर्माण हो या अन्य किसी भी प्रकार का निर्माण करें तो उसे सबसे पहले आपका पूजन करना होगा |

और जो भी व्यक्ति किसी भी प्रकार के निर्माण के पूर्व आपका पूजन जो नहीं करेगा वह दरिद्रता एवं शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होगा |

विश्वकर्मा प्रकाश में कहा गया है कि वास्तु देव भूमि पर शयन करते हुए कहते हैं कि वास्तु देव के शरीर में अनेक देवताओं का वास है के समय वास्तु देव की देवकी उत्थान उत्तान देह का स्मरण किया जाता है | जब वास्तुदेव को पृथ्वी पर फैंका गया था तब उकासिर ईशान कोण और पैर नेतृत्व दिशा में थे |

वास्तु चक्र के अनुसार वास्तु पुरुष प्रत्येक माह में अपनी दिशा बदलता है जिस महीने में वास्तु देव की  सृष्टि जिस और देखती है तथा उसके पैर जिस दिशा में हूं उस दिशा में कुआं, तालाब मंदिर या घर का निर्माण में उस महीने में नहीं करना चाहिए|

जिसका वर्णन हमारे खात निर्णय चक्र से ज्ञात किया जाता है से से विवाह देवालय भवन तालाब आदि का शुभारंभ शिलान्यास एवं स्वतंत्र ओपन का विधान भी है | तो यह थी वास्तु वास्तुशास्त्र के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें जिन्हें शायद आपने आज से पहले कभी नहीं सुना होगा |

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