शनि देव की उत्पत्ति की कथा-Shani Dev Ki Utpatti Ki Katha

शनि देव की उत्पत्ति की कथा-Shani Dev Ki Utpatti Ki Katha

शनि देव की उत्पत्ति- जय शनि देव जय जय शनि देव| अपने यह जयकार तो सुना ही होगा| इनका नाम सुनकर अच्छे से अच्छे लोगों का ह्रदय कापने लग जाता है| ऐसी छवि है शनि देव की| फिर वो चाहे देव हो या दानव, जानवर हो या मानव| यह सबके काल कहे जाते हैं| पर क्या यही उनकी असलियत है? क्यों उन्हें इतना क्रूर ग्रह माना जाता है? इस संसार में कोई भी हो उनको शनि देव के प्रकोप का खौफ खा जाता है|

कुल मिलाकर शनि को क्रूर ग्रह माना जाता है| लेकिन यह सत्य नहीं है| ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शनि देव को न्यायधीश कहें या दंडाधिकारी ये संसार में यही भूमिका का निर्वहन करते हैं| शनि देव किसी को भी उसके कर्म के आधार पर उसका न्याय करते हैं| वह अच्छे कर्म का परिणाम अच्छा और बुरे कर्म का परिणाम बुरा देने वाले ग्रह हैं|

यदि कोई व्यक्ति शनि देव  के कोप का शिकार है तो रूठे हुए शनि देव को मनाया भी जा सकता है| इसके लिये शनि देव की जयंती का दिन तो इस काम के लिये सबसे उचित माना जाता है| चलिये अब जानते हैं कि शनि देव की जन्म की क्या कथा है| और क्यों इतने क्रुद्ध रहते हैं?

शनि देव की जन्म कथा

शनि देव के जन्म के बारे में स्कंदपुराण के काशीखंड में जो कथा मिलती वह कुछ इस प्रकार है| इस सृष्टि के रचियता ब्रम्हा जी के मानस पुत्र राजा दक्ष थे| जिनकी कन्या संज्ञा का विवाह नव ग्रह के राजा सूर्य देव के साथ हुआ था| सूर्य देव का तेज बहुत अधिक था जिसको लेकर दक्ष कन्या संज्ञा निरंतर परेशान रहती थी|

वह सोचा करती कि किसी तरह सूर्य देव के ताप की अग्नि को कम करना होगा| जैसे-तैसे  करके दिन बीतते गये संज्ञा गर्भवती हुई और उसके गर्भ से वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना तीन संतानों ने जन्म लिया| संज्ञा अब भी सूर्य देव के तेज से उनके ताप से घबराती थी| फिर एक दिन उन्होंने हिम्मत कर के निर्णय लिया कि वे तपस्या कर सूर्य देव के तेज को कम करेंगी|

लेकिन बच्चों के पालन-पोषण और सूर्य देव को इसकी भनक न लगे इसके लिये उन्होंने एक युक्ति निकाली उन्होंने अपने तप से अपनी हमशक्ल को पैदा किया जिसका नाम संवर्णा रखा| संज्ञा ने बच्चों के पालन-पोषण और पति सूर्य देव की जिम्मेदारी अपनी छाया संवर्णा को दी और कहा कि अब से मेरी जगह तुम सूर्य देव की सेवा और बच्चों का पालन-पोषण करते हुए नारी धर्म का पालन करोगी| परन्तु यह यह गुप्त बात सिर्फ मेरे और तुम्हारे बीच ही बना रहना चाहिये| किसी को भी हमारे मध्य हुई इस बात का कभी भी पता न चलने पाये|

यह कह कर संज्ञा वहां से चलकर अपने पिता दक्ष के घर पंहुची और पिता को अपनी समस्या के बारे में बताया तो पिता ने उन्हें डांट फटकार लगाते हुए पति सूर्य देव के पास वापस भेज दिया| लेकिन संज्ञा वापस न जाकर वन में चली गई और एक घोड़ी का रूप धारण कर घोर तपस्या में लीन हो गई| उधर सूर्य देव को तनिक भी आभास नहीं हुआ कि उनके साथ रहने वाली संज्ञा उनकी पत्नी संज्ञा नहीं बल्कि उनकी छाया संवर्णा है|

इधर संवर्णा अपने नारी धर्म का पालन करती रही उनके छाया रूप होने के कारण उन्हें सूर्यदेव के तेज से भी कोई समस्या नहीं हुई| सूर्यदेव और संवर्णा के मिलन से भी मनु, शनि देव और भद्रा (तपती) तीन संतानों ने जन्म लिया|

जब शनि देव छाया के गर्भ में थे| तो छाया ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की| वो भगवान शिव की तपस्य में इतनी लीन रहती थी की उन्हें खाने-पीने की सुध तक उन्हें न रही| इस घोर तपस्या को करते हुये भूख-प्यास, धूप-गर्मी सहने के कारण उसका प्रभाव छाया के गर्भ मे पल रही संतान यानि कि शनि पर भी पड़ा और उनका रंग काला हो गया|

अंततः जब छाया के गर्भ से शनि देव का जन्म हुआ तो नव जन्मे पुत्र का शारीरिक रंग को देखकर सूर्य देव ने छाया पर संदेह किया और उन्हें अपमानित करते हुए कह दिया कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता|

चूँकि छाया ने भगवान शिव की घोर तपस्य की थी| फलस्वरूप मां के तप की शक्ति शनि देव में भी आ गई थी| और फिर जब उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्यदेव को देखा तो सूर्य देव का शारीरिक वर्ण एकदम काला हो गया और उनके घोड़ों की चाल भी रूक गयी|

अपना स्वयं का वर्ण काला देख कर परेशान होकर सूर्य देव को भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी| इसके बाद भगवान शिव ने सूर्य देव को उनकी गलती का आभास करवाया| फिर सूर्य देव अपने किये का पश्चाताप करने लगे और अपनी गलती के लिये क्षमा याचना कि इस पर उन्हें फिर से अपना असली रूप वापस मिला| लेकिन पिता-पुत्र के बीच का संबंध जो एक बार खराब हुआ| तबसे लेकर अब-तक इतने युग बीत गए पर आज भी शनि देव को अपने पिता सूर्य का विद्रोही माना जाता है|

पिता-पुत्र के बीच आज-तक मधुर सम्बन्ध स्थापित नहीं हो पाया| और अन्य पौराणिक ग्रंथो में दोनों पिता-पुत्र के मध्य ३६ के आंकड़े की भिन्न-भिन्न कथा है|

क्या कारण है कि शनि देव की दृष्टि टेढ़ी है

जैसा कि अपने उपरोक्त कथा में पढ़ा है कि शनि देव अपनी माता के अपमान के कारण क्रोधित हो गए थे| वहीं ब्रह्म पुराण में इसकी कुछ और ही कहानी बतायी गयी  है| ब्रह्मपुराण के अनुसार शनि देव अपने बाल्यकाल से भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त थे| जब शनिदेव युवा हुए तो चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह हुआ|

शनि देव की पत्नी सती, साध्वी और परम तेजस्विनी थी| लेकिन वह भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में इतना लीन रहते थे कि  जैसे उन्होंने ने अपनी पत्नी को भुला ही दिया| एक रात ऋतु स्नान कर संतान प्राप्ति की इच्छा लिये वह शनि के पास आयी लेकिन वह हमेशा कि तरह भगवान श्री कृष्णा की भक्ति में लीन थे|

वे शनि देव की प्रतीक्षा कर-कर के थक गई और उनका ऋतुकाल निष्फल हो गया| आवेश में आकर उन्होंने अपनी पति को ही शाप दे दिया कि जिस पर भी उनकी नजर पड़ेगी वह नष्ट हो जायेगा| श्राप के कारण ध्यान टूटने पर शनिदेव ने पत्नी को मनाने की कोशिश की उन्हें भी अपनी गलती का अहसास हुआ लेकिन तब-तक तीर कमान से छूट चुका था| अब वो वापस नहीं आ सकता था| अपने श्राप के प्रतिकार की ताकत उनमें थी ही नहीं| इसलिये शनि देव अपना सिर नीचा करके रहने लगे ताकि उनकी टेढ़ी दृष्टि उनकी धर्म-पत्नी पर न पड़े|

किस कारण से शनि देव को रावण ने बंदी बनाया

शनि देव की ढ़ाई व साढे साती सुनकर ज्यादातर लोगों के मन में यह सवाल आता होगा कि ये २ और ७ भी तो हो सकता है| पर ऐसा नहीं है इसका कारण है शनि देव की धीमी चाल है जो रावण के द्वारा उनके पैर पर प्रहार करने के कारण हो गयी थी| हिन्दू धर्म पुराणों शास्त्रों में इसका वर्णन मिलता है| हम आपको इसके बारे में पूरी जानकारी देने का प्रयास करते हैं|

रावण ने क्यों किया शनि देव के पैर पर प्रहार

रावण एक प्रखंड विद्वान और ज्योतिष शास्त्र का ज्ञाता था| रावण चाहता था कि उसका पुत्र दीर्घायु और सर्व शक्तिमान हो| जब रावण की पत्नी मंदोदरी गर्भवती थी तब रावण ने इच्छा जताई की उसका होने वाला पुत्र ऐसे ग्रह-नक्षत्रों में पैदा हो जिससे कि वह महा-पराक्रमी और दीर्घायु हो|

इसके लिए रावण ने सभी नव-ग्रहों को पुत्र मेघनाथ के जन्म के समय शुभ और सर्वश्रेष्ठ स्थिति में रहने का आदेश दिया| लेकिन रावण के डर से सारे नव-ग्रह रावण की इच्छा के अनुसार शुभ व उच्च स्थिति में विराजमान हो गए, लेकिन शनि देव को रावण की ये बात कतई पसंद नहीं आई| 

किसी भी व्यक्ति की जन्म-कुंडली में शनि देव उस व्यक्ति की आयु की रक्षा करते हैं| रावण यह बात भली-भांति जानता था कि शनि देव उसकी बात मानकर शुभ स्थिति में विराजित नहीं होंगे| इसलिए रावण ने अपने बल का प्रयोग करते हुए शनि देव को भी ऐसी स्थिति में रखा, जिससे उसके होने वाले पुत्र की उम्र लंबी हो सके|

शनि देव न्याय के देवता हैं इसलिए वे रावण द्वारा इक्षित मनचाही स्थिति में तो चले गए| लेकिन जैसे ही मेघनाद के जन्म का समय आया तो उन्होने इस दौरान अपनी दृष्टि वक्री कर ली| जिसके कारण से मेघनाद अल्पायु हो गया|

जैसे ही इसका पता रावण को चला तो वो क्रोधित हो गया और रावण ने क्रोध के आकर अपनी तलवार से शनि देव के पैर पर प्रहार किया| तब से शनि देव लंगड़ाकर चलते हैं| और इसलिये अन्य सभी ग्रहों की अपेक्षा वे धीमी चाल से चलते हैं|

हनुमान जी ने शनि देव को रावण के कैद से मुक्त किया

हनुमान जी ने शनि देव के साथ-साथ सभी ग्रहों को रावण की कैद से मुक्त कराया था| जिस कारण से शनि देव ने हनुमान जी को यह वचन दिया था कि जो भी हनुमान जी की पूजा करेगा मैं उसे कभी कष्ट नहीं दूंगा| इसीलिए शनि या साढ़े साती के निवारण के लिए हनुमानजी की पूजा करनी चाहिए|

शनि की वक्रद्रष्टि से बचने के लिए रोजाना हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए| इससे हनुमान जी अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।

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