श्री गणेश चालीसा-श्री गणेशजी की आरती

नमस्कार मैं आप सभी का सहृदय स्वागत करता हूँ, आज बुधवार का दिन है और हिन्दू धर्मग्रन्न्थों और मान्यता के अनुसार बुधवार का दिन गणेश भगवान का दिन कहा जाता है और आज के दिन में हरे रंग का बहुत ज्यादा महत्व है, कहा जाता है कि हिन्दू धर्म में सभी देवी-देवताओं में सबसे पहले प्रथम पूज्य देव अगर कोई है तो वो श्री गणेश जी हैं, जिन्हें बुद्धिदाता, दुःख हरता, सुख करता, मंगलमुरती, कमनापुरती, अष्टविनायक आदि कहा जाता है और बुद्ध ग्रह का प्रतिनिधित्व भी करते है और बुद्ध ग्रह का रंग हरा होता है और गणेश भगवान जी के आराध्य ग्रह केतु हैं माना जाता है कि बुधवार के दिन जो भी व्यक्ति गणेश का व्रत करता है और उनके चालीसा का पाठ और आरती करता है उसके जीवन में कभी भी बुधग्रह से संबंधित कोई भी समस्या नहीं आती श्री गणेश भगवान अपने भक्त कि सारी समस्या का समाधान करते हैं और ऐसे व्यक्तियों का बुधग्रह के साथ साथ केतु ग्रह भी बहुत अच्छा फल प्रदान करता है और आज के दिन भगवान श्री गणेश जी पूजा करने के बाद उन्हें बेसन के लड्डू या बूंदी के लड्डू का भोग और साथ में दूर्वा घास अर्पित करना चाहिये, जो कि भगवान श्री गणेश को सर्वोअत्ति प्रिय है| आज मैं आपके समक्ष गणेश भगवान जी का चालीसा और आरती प्रस्तुत कर रहा हूँ, इस चालीसा में भगवान श्री गणेश जी के जन्म कि पूरी कथा है और साथ में उन्हें देवी-देवताओं में प्रथम पूज्य क्यों कहा जाता है उसका भी वर्णन है | आशा करता हूँ यह आपको पसंद आयेगा |

श्री गणेश चालीसा

दोहा – बुद्धि भरन अशरण शरण, हराना अमंगल जाल | सिद्धि-सदन करिवर वदन, जय-जय गिरिजा लाल||

अमात्रिक- गहत चरण राज गज बदन, लहत परम पद लक्ष| कटत अगिन अघ तन अघट, रटत सकल भय भक्ष||

चैपाई- जय-जय-जय गणपति गणराजू | मंगल भरण कारन शुभ काजू ||

 जय गजबदन सदन सुखदाता | विश्व विनायक बुद्धि-विधाता ||

वक्रतुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन | तिलक त्रिपुंड भाल मन भावन ||

 अर्धचंद्र मस्तक पर सोहै | छवि लखि सुर-नर मुनि मन मोहै ||

 राजित मणि मुक्तन उर माला | स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ||

 पुस्तक पाणी क़तर त्रिशूला | मोदक भोग सुन्दंधित फूला ||

सुन्दर पीताम्बर तन साजित | चरंपुदाका मुनि मन राजित ||

 धन शिव सुवन षडानन भ्राता | गौरी लालन विश्व विख्याता ||

ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुढारे | मुसक वहां सोहत द्वारे ||

कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी | एक समय गिरिराज कुमारी ||

बनयो बदन मैल कि मूर्ति | अति छविवन्नत मोहिनी सूरती ||

सो  द्वारे ड्योढ़ी पर लाई |द्वारपाल करी तुहिं बैठाई  ||

असुर एक शिव बनावै | छल करनी हित घात लगावे ||

ताहि समय शंकर जो आयो | बिनु पहिचाने जान नहीं पायो ||

 पूछहिं शिव तुम कही के लाला | बोलत भे तुम वचन रसाला ||

मैं गिरिजसुत तुमहिं बतावत | बिनु चीन्हे कोउ जान न पावत ||

 भवन धरो जनि पाँव उभरी | अहै कौन पहिचान तुम्हारी ||

आवहिं मातु बुझी तब जाओ | बालक से जनि रारी बढाओ ||

 धरयो शम्भू जब पाँव अगारी | मच्यो तुरत सरबर तब भारी ||

तत्क्षण कछु शंका उर धारी || शिव तिरशूल भूल बस  मारी ||

 सिरस फूल सैम शिर कटी गयऊ | चट उड़ी गगन लोप तहँ भयऊ ||

 शम्भू गए जब भावन मंझारी | बैठी जहाँ गिरिराजकुमारी ||

कहन  लगे शिव मन सकुचाये | कहो सति  सुत कहाँ ते जाये ||

तुरतहिं कथा प्रकट है सारी | करी सोच गिरिजा मन भारी ||

 कियो न भल स्वामी तुम जाओ | लाओ सुवन जहाँ से पाओ ||

चलै तुरत सुनी शिव विज्ञानी | चट  इक हस्ती के शिव आनी ||

धड़ ऊपर थापित करी दीन्हें | प्राण वायु सञ्चालन कीन्हे ||

नाम गणेश शंभू तव कीन्हे | बनहू बुद्धि निधि अस बार दीन्हे ||

 प्रथम पूज्य तुम हो सुखदाता | अति शुचि विद्या बुद्धि सुज्ञाता ||

नाम तुम्हार प्रथम लै कोई | कारज करै सकल सिध्ही होई ||

तुम सुमिरत सुख सम्पति नाना |  तुम्हें बिसारे नहीं कल्याना ||

तुम्हरो शाप आज जग अंकित | चौथ मयंक भयो अलंकित ||

बुद्धि परीक्षा तुही कीन्हा | पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ||

चले षडानन भूमि भुलाई | रचे बैठी तुम बुद्धि उपाई ||

‘राम’ नाम लिखी माहि पर अंका | सात भंवर दी करी न शंका ||

धनि गणेश कही शिव मन हर्षे | नभ्ते सुरन सुमन बहु वर्षे ||

तुम्हरो महिमा बुद्धि बड़ाई | शेष सहसमुख सके न गाई ||

 मैं मति हिन मलिन दुखारी | करों कौन विधि विनय तुम्हारी ||

भजत राम सुन्दर प्रभु दासा | लग प्रयाग ककरा दुर्वासा ||

अब प्रभु दया दीन पर कीजै | अपनी भक्ति-शक्ति कछु दीजै ||

                                   दोहा

श्रीगणेश चालीसा, पाठ करै धरी ध्यान | नित नवमंगल गृह लहै मिले जगत सन्मान || दुई सहस्त्र सन विक्रमी,कृष्णा भद्र तिथि गंग | पूरण चालीसा भयो, सुन्दर भक्ति अभंग ||

घनाक्षरी अमात्रिक (अंतिम विनय) जय-जय-जय, गजबदन दशन  जय-जय-जय गजबदन दशन इक गहत चरण रज, सहत सकल भय | जय-जय-जय सद्भवन, भरण यश, हरण, सघन अघ कारन अगण छय || दरसत चरण अमर रस बरसत हरषत जन अर्चत मन तनमय || अशरण शरण,कमल पद परसत भनत सऊनदर, भजन जगत जय ||    

                                    इति गणेश – चालीसा सम्पूर्ण

श्री गणेशजी की आरती

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश, देवा .
माता जाकी पारवती, पिता महादेवा ..

एकदन्त, दयावन्त, चारभुजाधारी,
माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी .
पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा,
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा ..

अंधे को आँख देत, कोढ़िन को काया,
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया .
‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा,
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ..

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