सूर्य देव की उत्पत्ति की कथा-Surya Dev Ki Utpatti Ki Katha

सूर्यदेव की उत्पत्ति की कथा-Surya Dev Ki Utpatti Ki Katha

सूर्य देव की उत्पत्ति – हमारे सौरमंडल में प्रमुख नौ ग्रहों को मान्यता दी गयी है और इस संसार में जीवित प्रत्येक व्यक्ति अपने दैनिक दिनचर्या में प्रतिदिन प्रातः काल से ले कर संध्या काल तक सूर्य देव के प्रतिदिन दर्शन करता है | और उनके द्वारा प्रदान की गयी रौशनी से अपने दैनिक कार्यों का निर्वहन करता है |

कभी-कभी इस सौरमंडल को देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि इस सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ होगा | और इस सृष्टि में ये प्रमुख ९ ग्रहों की उत्पत्ति या उनका जन्म कैसे हुआ?हमारे सौरमंडल में और हिन्दू धर्म पुराणों के अनुसार सभी ९ ग्रहों में एकमात्र सूर्यदेव या सूर्य ग्रह ही इन सभी ९ ग्रहों के प्रतिनिधित्व करते हैं |

यानि कि सूर्य देव इन सभी ९ ग्रहों के राजा हैं और इस संसार में किसी भी जीवित व्यक्ति ने भगवान को तो नहीं देखा है पर  सूर्य देव के साथ चंद्रदेव ऐसे देवता हैं जिनके साक्षात दर्शन हमें प्रतिदिन  होते हैं।अगर हम इस संसार में जीवित व्यक्तियों की बात करें तो किसी ने भी भगवान को नहीं देखा है, लेकिन सूर्य और चंद्रमा को हर व्यक्ति ने देखा है।

 ज्योतिष में सूर्य और चंद्रमा दोनों ही ग्रह माने गए हैं, जबकि विज्ञान कहता है कि चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है। ज्योतिष शास्त्र में नवग्रहों में सूर्य को राजा और चंद्रमा को रानी व मन का कारक माना गया गया है।

ये सूर्य देव ही हैं जिनके प्रकाश से ही हम समय की खोज कर सके हैं। ये सूर्यदेव है हैं जिन्हें हम आदित्य, भास्कर, मार्तण्ड आदि अनेक नामों से जाना जाता है। विज्ञान के अनुसार सूर्य भले ही एक ग्रह मात्र हों जो स्थिर रहते हैं और पृथ्वी के घूमने से वे घूमते दिखाई देते हैं |

 लेकिन पौराणिक कहानियों के अनुसार वे सात श्वेताश्व रथ पर सवार रहते हैं और हमेशा गतिमान ही रहते हैं । इतना ही नहीं प्रकाश स्वरूप भगवान सूर्य के आदित्य या मार्तण्ड कहे जाने के पिछे भी एक कहानी है? आइये अब जानते हैं सूर्य देव की उत्पत्ति या जन्म की कथा।

हमारा विज्ञान भी मानता है कि सूर्य के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। हिन्दू धर्म के वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। सूर्य से ही धरती पर जीवन संभव है और इसीलिए वैदिक काल से ही भारत में सूर्य की उपासना का चलन रहा है। वेदों की ऋचाओं में अनेक स्थानों पर सूर्य देव की स्तुति की गई है।

यहाँ पर मैं आपके समक्ष सूर्य देव के जन्म से जुडी २ पौराणिक कथा बताने जा रहा हूँ

सूर्य देव के जन्म की पौराणिक कथा

हिन्दू धर्म की पौराणिक कथा के अनुसार यह  माना यह जाता है कि सृष्टि आरंभ में अंधेरा ही अंधेरा था, लेकिन भगवान श्री विष्णु के नाभिकमल से जन्मे भगवान ब्रह्मा ने अपने मुखारबिंद से सबसे पहले जो शब्द उच्चरित किया वह था ॐ मान्यता है कि ॐ के उच्चारण के साथ ही एक तेज भी पैदा हुआ जिसने अंधकार को चीरकर रोशनी फैलाई।

कहते हैं ॐ सूर्य देव का सूक्ष्म प्रकाश स्वरूप था। इसके पश्चात ब्रह्मा के चार मुखों से वेदों की उत्पत्ति हुई जो  इस तेज रूपी ॐ स्वरूप में जा मिले। फिर वेद स्वरूप यह सूर्य ही जगत की उत्पत्ति, पालन व संहार के कारण बने। मान्यता तो यह भी है कि ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर ही सूर्यदेव ने अपने महातेज को समेटा व स्वल्प तेज को धारण कर लिया। इस प्रकार से यह पहली जन्म कथा है सूर्य देव की |

अब जानते हैं एक और इसी समान सूर्य देव के जन्म की एक और पौराणिक कथा |

सूर्य जन्म की पौराणिक कथा

हमारे हिन्दू धर्म की पौराणिक कथा के अनुसार जब इस सृष्टि का प्रारंभ हुआ तब इस सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा जी के मुख से ‘ऊँ’ प्रकट हुआ था, वही सूर्य का प्रारम्भिक सूक्ष्म स्वरूप था। इसके बाद भूः भुव तथा स्व शब्द उत्पन्न हुए। ये तीनों शब्द पिंड रूप में ‘ऊँ’ में विलीन हए तो सूर्य को स्थूल रूप मिला। सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न होने से इसका नाम आदित्य पड़ा।

कैसे सूर्य देव बने आदित्य

सूर्य देव के जन्म की यह कथा भी बहुत प्रचलित है। इस कथा के अनुसार अनुसार ब्रह्मा जी के पुत्र मरिचि और मरिचि के पुत्र महर्षि कश्यप थे। इनका विवाह हुआ प्रजापति दक्ष की कन्या दीति और अदिति से हुआ। दीति के गर्भ से दैत्य पैदा हुए और अदिति के गर्भ से देवताओं का जन्म हुआ, जो अपने जन्म के समय से ही एक-दुसरे के शत्रु थे और हमेशा आपस में लड़ते रहते थे।

इसे देखकर देव माता अदिति बहुत दुखी हुई। वह सूर्य देव की उपासना करने लगीं। उनकी तपस्या से सूर्यदेव प्रसन्न हुए और देव माता अदिति के पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय पश्चात उन्हें गर्भधारण हुआ। गर्भ धारण करने के पश्चात भी अदिति कठोर उपवास रखती, जिस कारण उनका स्वास्थ्य काफी दुर्बल रहने लगा।

महर्षि कश्यप इससे बहुत चिंतित हुए और उन्हें समझाने का प्रयास किया कि संतान के लिए उनका ऐसा करना ठीक नहीं है। मगर, अदिति ने उन्हें समझाया कि हमारी संतान को कुछ नहीं होगा ये स्वयं सूर्य स्वरूप हैं। समय आने पर उनके गर्भ से तेजस्वी बालक ने जन्म लिया, जो देवताओं के नायक बने, ग्रहों के राजा और बाद में असुरों का संहार किया।

अदिति के गर्भ से जन्म लेने के कारण इन्हें आदित्य कहा गया। वहीं कुछ कथाओं में यह भी आता है कि अदिति ने सूर्यदेव के वरदान से हिरण्यमय अंड को जन्म दिया, जो कि तेज के कारण मार्तंड कहलाया।

इनके जन्म की विस्तृत कथा भविष्य, मत्स्य, पद्म, ब्रह्म, मार्केंडेय, साम्ब आदि पुराणों में मिलती है। प्रात:काल सूर्योदय के समय सूर्यदेव की उपासना करने से सूर्यदेव प्रसन्न रहते हैं और जातक पर कृपा करते हैं।

सूर्य पापी नहीं क्रूर ग्रह हैं

अपनी माता की इच्छा पूर्ण करते हुए सूर्य देव ने शत्रुओं का निर्दयता से दमन किया इसलिए सूर्य को क्रूर ग्रह कहा गया है नाकि दुष्ट या पापी। सूर्य की जन्म भूमि कलिंग देश, गोत्र कश्यप और जाति ब्राह्मण है। सूर्य देव को गुड़ की बलि से, गुग्गल धूप से, रक्त चन्दन से, अर्क की समिधा से, कमल पुष्प से प्रसन्न होते हैं।

कहा जाता है कि सूर्य देव के रथ में केवल एक पहिया है। सात अलग-अलग रंग के तेजस्वी घोड़े उसे खींचते हैं और उनका सारथी लंगड़ा है, मार्ग निरालम्ब है, घोड़े की लगाम की जगह सांपों की रस्सी है।

श्रीमद्भागवत्‌ पुराण के अनुसार सूर्य के रथ का एक चक्र(पहिया) संवत्सर कहलता है। इसमें मास रूपी बारह आरे होते हैं, ऋतु रूप में छः नेमिषा है, तीन चौमासे रूप नाभि है। रस रथ की धुरी का एक सिरा मेरूपर्वत की चोटी पर है और दूसरा मानसरोवर पर्वत पर, इस रथ में अरुण नामक सारथी भगवान सूर्य की ओर रहता है।

सूर्य देव २ पत्नियाँ और 10 पुत्र हैं

भगवान्‌ सूर्य की दो पत्नियां हैं संज्ञा और निक्षुभा। संज्ञा के सुरेणु, राज्ञी, द्यौ, त्वाष्ट्री एवं प्रभा आदि अनेक नाम हैं तथा छाया का ही दूसरा नाम निक्षुभा है। संज्ञा विश्वकर्मा त्वष्टा की पुत्री है। भगवान्‌ सूर्य को संज्ञा से वैवस्वतमनु, यम, यमुना, अश्विनी कुमार द्वय और रैवन्त तथा छाया से शनि, तपती, विष्टि और सावर्णिमनु ये दस संतानें हुई।

सूर्य देव का स्वरुप इस प्रकार है

सूर्य देव  सिंह राशि के स्वामी हैं। इनकी महादशा ६ वर्ष की होती है। इनका प्रिय रत्न माणिक्य है। सूर्य की प्रिय वस्तुएं सवत्सा गाय, गुड़, तांबा, सोना एवं लाल वस्त्र आदि हैं। सूर्य की धातु सोना और तांबा है। सूर्य देव की जप की संख्या ७००० (सात हजार)  है।

इनका बीज मंत्र है- ‘ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः’ है। वहीं, सामान्य मंत्र- ‘ऊँ घृणि सूर्याय नमः’ है। यदि सूर्य निर्बल हो तो नित्य सूर्य उपासना, सूर्य को अर्ध्य देने से, रविवार का व्रत करने से और सूर्यदेव के नित्य दर्शन करने से सूर्यदेवता प्रसन्न और बली होते हैं|

और यदि जो कोई भी व्यक्ति अगर सूर्य देव का शुभ फल पाने के लिये रविवार का व्रत करता है तो उसे निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिये |

  • रविवार कोई सूर्योदय के पूर्व उठकर स्नान कर लेना चाहिये
  • सूर्योदय के समय तांबे के लोटे में जल भर कर उसमे थोडा गुड या शक्कर, अखंडित चावल, रक्त पुष्प अर्थात कोई सा भी लाल पुष्प, थोड़ी हल्दी मिलाकर सूर्यदेव को अर्घ्य देना चाहिये
  • अर्घ्य देते समय ॐ सूर्याय नमः या ॐ घृणी सूर्याय नमः मंत्र का जाप करते हुये अर्घ्य देना चाहिये
  • रविवार को बिना नमक के व्रत रखना चाहिये और संध्याकाल में फल का सेवन करना चाहिये
  • इस दिन किसी भी प्रकार से मांस मदिरा का सेवन भूल कर भी नहीं करना चाहिये
  • रविवार के दिन पूर्ण रूप से ब्रम्हचर्य का पालन करना चाहिये
  • जितना हो सके उतना ज्यादा से ज्यादा सूर्य देव के बीज मंत्र का जाप करना चाहिये

मित्रों मैं आशा करता हूँ कि आप सभी को सूर्य देव की उत्पत्ति या जन्म की ये कथा बहुत पसंद आयी होगी| कृपया आप सभी इसे ज्यादा से ज्यादा साझा करें और इस पर आपके क्या विचार हैं कमेंट के माध्यम से हमें बतायें| इस लेख को पढने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद |

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