जन्माष्टमी-श्री कृष्ण जन्मोत्सव-Krishna-Janmashtami

जन्माष्टमी- श्री कृष्ण के जन्म की कथा

जन्माष्टमी-नन्द के आनंद भयो जय कन्हनैयालाल की | जन्माष्टमी का पर्व भारतवर्ष में बड़ी ही धूम-धाम से मनाया जाता है, यह पर्व भगवान श्री कृष्ण के जन्म के उपलक्ष में मनाया जाता है | भगवान श्री कृष्णा के जन्म की कथा बहुत ही अद्भुद है |

भगवान श्री कृष्णा, भगवान श्री हरि विष्णु के अवतार हैं | पौराणिक कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्णा का जन्म द्वापरयुग में हुआ था और भगवान के इस जन्म ने तो मनो मनुष्य जीवन में ममता का  एक अविशवसनीय उदाहरण प्रस्तुत किया |

एक ओर जहाँ भगवान श्री कृष्णा का जन्म उनकी माता देवकी ने दिया और दूसरी ओर उनका पालन-पोषण माता यशोदा ने किया | यह ममता कि एक अद्भुद गाथा है, इस गाथा से यह प्रेरणा मिलती है कि जन्म देने वाली माँ और पालन पोषण करने वाली माँ दोनों ही सर्वश्रेष्ठ हैं |

परन्तु किसी अन्य कि संतान को अपनी संतान सामान पालन पोषण करना, लाड-प्यार करना, दुलार करना  यह संसार कि सभी माताओं के लिए एक आदर्श बना जो कि भगवान श्री कृष्णा के जन्म का मनुष्य जीवन के लिए यह एक महत्वपूर्ण उद्देश्य भी था |

जन्माष्टमी-भगवान श्री कृष्णा कि जनम कथा

श्री कृष्णा भगवान का जन्म भाद्रपद के कृष्णपक्ष कि  अष्टमी तिथि को हुआ था अतः इसीलिये इसे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कहा जाता है | कृष्णपक्ष की  इसी तिथि की घनघोर काली अंधेरी मध्य  रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वासुदेव  की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी अष्टम संतान के रूप में  जन्म लिया था।

इसी  शुभ तिथि को श्री कृष्णा जन्माष्टमी कहा जाता है और भारतवर्ष  में बड़ी धूमधाम से भगवान श्री कृष्णा के जन्मोत्सव को मनाया जाता  है।

इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के  जन्म की कथा भी सुनते-सुनाते हैं, जो इस प्रकार है

पौराणिक कथा के अनुसार द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा राज्य में राज करता था। उसका एक पुत्र जिसका नाम कंस था, वह बहुत ही निर्मम,निर्दयी, घोर अत्याचारी था | अपने राज्य पर शासन करने के लिये कंस ने अपने पिता को बल एवं छलपूर्वक राजा की गद्दी से उतार दिया औरअपने पिता को कारागार में बंदी बना लिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा।

अपने पिता से राज्य हथियाने के बाद कंस और भी निर्मम और भी ज्यादा अत्याचारी को गया था | वह दिन-प्रतिदिन अपने राज्य कि जनता सहित अन्य गांवों की जनता, साधू-संत महात्मा इत्यादि पर असीमित अत्याचार करने लगा |

कंस अपने आपको भगवान समझने लगा था और उसे यह लग रहा था कि वह सर्वशक्तिशाली है न तो कोई उसे हरा सकता है और न ही कोई उसे मार सकता है |

 कंस के अत्याचार से दुखी हो कर देव दानव मानव संत इत्यादि भगवान श्री हरि विष्णु से कंस के अंत कि प्रार्थना की तो भगवान विष्णु ने कहा कि कंस का वध करने के लिए वह पृथ्वीलोक पर श्री कृष्णा के रूप में अवतार लेंगे और उसका वध करेंगे |

कंस की एक बहन थी जिसका नाम देवकी था और कंस संसार में केवल मात्र अपनी बहन देवकी को अपने प्राणों से भी ज्यादा प्यार करता था | कंस का एक परम मित्र था वासुदेव जो कि यदुवंशियों का राजा हुआ करता था | कंस ने अपनी बहन का विवाह अपने परम मित्र वासुदेव से कर दिया था |   

वासुदेव-देवकी के विवाह के पश्चात कंस अपनी बहन देवकी को उसके ससुराल पहुंचाने जा रहा था। तभी रास्ते में आकाशवाणी हुई- “हे कंस,  अपनी जिस बहन देवकी को तू बड़े प्रेम से विदा कर उसके ससुराल  ले जा रहा है, उसी  कि गर्भ में तेरा काल बसा हुआ  है। और तेरी बहन देवकी  के गर्भ से उत्पन्न आठवें पुत्र के हाथों तेरा वध होगा वही तेरा वध करेगा।“

कंस का वासुदेव-देवकी का कारागृह में बंदी बनाना

 यह सुनकर कंस के मन में विचार आया कि मैं अपने प्राणों से भी प्यारी बहन को कैसे मार सकता हूँ अगर मारना ही है तो उसके पति वासुदेव को मार देता हूँ क्यों कि जब वासुदेव ही नहीं रहेगा तो देवकी कि कोख से कोई संतान कैसे जन्म लेगा |

और जैसे ही कंस ने वासुदेव को मारने के लिए तलवार उठाया तब उसकी बहन देवकी ने कंस से विनयपूर्वक कहा- मेरे गर्भ से जो संतान जन्म लेगी, मैं उस संतान को स्वयं तुम्हारे सामने ला दूंगी कृपया तुम अपनी बहन के सुहाग को मत उजाडो फिर तुम्हें अपने बहनोई को मारने से क्या लाभ मिलेगा?’

कंस ने अपनी बहन  देवकी की बात को मान लिया और वासुदेव-देवकी सहित वह मथुरा वापस चला आया। फिर उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल कर अपना बंदी बना लिया ।

समय के साथ-साथ वासुदेव और देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। जब आठवां बच्चा होने वाला था तब कंस ने कारागार में वासुदेव-देवकी पर कड़े पहरे बैठा दिए गए।

उसी दौरान वासुदेव के मित्र नन्द जो कि गोकुल गाँव के प्रधान थे ठीक उसी समय नंद की पत्नी यशोदा भी गर्भवती थी और उसके गर्भ से भी एक संतान जन्म लेने  वाला था।

इधर सृष्टि ने पूर्व में ही निर्धारित किया हुआ था उस आकाशवाणी के अनुसार वासुदेव और देवकी के आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय । जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से नन्द की पत्नी यशोदा के गर्भ से भी एक कन्या का जन्म हुआ, जो प्रभु द्वारा रची गई  एक मायाथी। 

जिस काल-कोठरी में देवकी-वासुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान श्री हरि विष्णु प्रकट हुए। यह देख कर दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- अब मैं पुनः तुम्हारे गर्भ में नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं और इसी गर्भ से मैं जन्म लूँगा ।

भगवान श्री हरि विष्णु ने वासुदेव से कहा तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या ने जन्म लिया है, उसे लाकर कंस के सुपुर्द कर दो।

इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो । इस कालकोठरी में उपस्थित जागते हुए सारे पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएगा  और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी।

उसी समय वासुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को एक सुपा में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे, वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और नन्द की कन्या को लेकर मथुरा आ गए। वासुदेव के वापस आते ही कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए।

अब कंस को सूचना मिलती है कि वासुदेव-देवकी को आठवां बच्चा पैदा हुआ है।

उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक कर मार  देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से उसने कहा- अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है और वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा और तेरा वध करेगा|

इस प्रकार श्री कृष्ण भगवान के जन्म कि कथा समाप्त होती है | आशा करता हूँ कि आपको यह कथा पसंद आयी होगी और भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना करता हूँ कि जिस प्रकार उन्होंने अपने मित्र सुदामा को धन-धान्य से सम्पन्न किया उसी प्रकार भगवान श्री कृष्णा इस संसार में उपस्थित सभी मनुष्यों को धन-धान्य, वैभव, ऐश्वर्या, स्वर्ण इत्यादि से सम्पन्न करें| धन्यवाद  

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